भारत के रामजेट आर्टिलरी गोले पाकिस्तान के पीछे के कमांड ठिकानों को कर सकते हैं तबाह, अब छिपने की कोई जगह नहीं मिलेगा..!
“आत्मनिर्भर भारत” पहल के तहत एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय सेना दुनिया की पहली ऐसी सेना बनने के बेहद करीब है, जो 155 मिमी रामजेट-सहायता प्राप्त आर्टिलरी गोलों को अपने बेड़े में शामिल करेगी। आईआईटी मद्रास और भारतीय सेना द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह क्रांतिकारी तकनीक ट्यूब आर्टिलरी की मारक क्षमता और रेंज को एक बिल्कुल नया आयाम..
नयी दिल्ली। “आत्मनिर्भर भारत” पहल के तहत एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय सेना दुनिया की पहली ऐसी सेना बनने के बेहद करीब है, जो 155 मिमी रामजेट-सहायता प्राप्त आर्टिलरी गोलों को अपने बेड़े में शामिल करेगी। आईआईटी मद्रास और भारतीय सेना द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह क्रांतिकारी तकनीक ट्यूब आर्टिलरी की मारक क्षमता और रेंज को एक बिल्कुल नया आयाम देने जा रही है।
पोखरण में सफल परीक्षण
राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में स्वदेशी रामजेट आर्टिलरी गोलों के विकासात्मक फायरिंग ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे कर लिए गए हैं।
फिलहाल यह परियोजना विकास और अनुकूलन (ऑप्टिमाइजेशन) के चरण में है। टीम निम्नलिखित पहलुओं पर काम कर रही है:
इष्टतम प्रदर्शन के लिए प्रमुख मापदंड
- माख 3 की गति पर भी स्थिर दहन दर (स्टेडी बर्न रेट) सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी पैरामीटर।
- एयर इंटेक सिस्टम का डिज़ाइन, जिससे उड़ान के दौरान ऑक्सीजन का कुशल संपीड़न संभव हो सके।
- माख 3 की गति पर गन प्रोपल्शन के जरिए फायरिंग के दौरान प्रतिरोध क्षमता, ताकि गोले अपनी थ्रस्ट बनाए रख सकें।
दोगुनी से भी अधिक रेंज: 60 किमी से 100 किमी+
सामान्य 155 मिमी आर्टिलरी गोलों की रेंज आमतौर पर 30 से 40 किलोमीटर होती है। लेकिन रामजेट तकनीक में ऐसा इंजन इस्तेमाल होता है, जो हवा से ऑक्सीजन लेकर तोप से दागे जाने के बाद भी निरंतर थ्रस्ट पैदा करता है।
- प्रारंभिक ऑपरेशनल रेंज: 60 से 80 किलोमीटर।
- भविष्य के संस्करण: 100 किलोमीटर से अधिक की रेंज का लक्ष्य।
- अत्यधिक गति: ये गोले माख 3 (लगभग 3704.4 किमी/घंटा) तक की रफ्तार हासिल कर सकते हैं, जिसे रोक पाना लगभग असंभव है।
यूनिवर्सल संगतता और रेट्रोफिटिंग
इस स्वदेशी तकनीक का सबसे बड़ा फायदा इसका “प्लग-एंड-प्ले” स्वरूप है। आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर पी.ए. रामकृष्णन के अनुसार, इस प्रणाली को मौजूदा 155 मिमी गोलों पर रेट्रोफिट किया जा सकता है।
इसका अर्थ यह है कि भारत को किसी नए प्लेटफॉर्म की जरूरत नहीं होगी। ये रामजेट गोले मौजूदा और भविष्य की सभी आर्टिलरी प्रणालियों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- एम777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर
- एटीएजीएस (एडवांस्ड टोइड आर्टिलरी गन सिस्टम)
- धनुष और शरंग तोपें
- के9 वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर
रणनीतिक बढ़त: डीप स्ट्राइक क्षमता
महंगे मिसाइलों के बजाय ट्यूब आर्टिलरी के जरिए गहरे हमले (डीप स्ट्राइक) करने की क्षमता चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं पर होने वाले उच्च तीव्रता वाले संघर्षों में भारत को निर्णायक बढ़त दे सकती है।
- लॉजिस्टिक्स टार्गेटिंग: दुश्मन के कमांड सेंटर, लॉजिस्टिक्स नोड्स और आगे तैनात सैनिकों से काफी पीछे स्थित हवाई अड्डों को नष्ट करने की क्षमता।
- काउंटर-बैटरी फायर: बढ़ी हुई रेंज के कारण भारतीय आर्टिलरी दुश्मन की तोपों पर वार कर सकेगी, जबकि स्वयं उनकी जवाबी फायरिंग की पहुंच से बाहर रहेगी।
- वैश्विक नेतृत्व: यह तकनीक भारत को आर्टिलरी नवाचार के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अग्रणी बनाती है, आयात पर निर्भरता को काफी कम करती है और उच्च तकनीक रक्षा निर्यात के नए रास्ते खोलती है।
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