बंगाल में गैर-विवादित कैबिनेट, टीएमसी से अलग छवि बनाने की कोशिश
पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भाजपा भविष्य में होने वाले कैबिनेट विस्तार में भी विवादित चेहरों को मंत्रालय से बाहर रखने की नीति जारी रख..
पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भाजपा भविष्य में होने वाले कैबिनेट विस्तार में भी विवादित चेहरों को मंत्रालय से बाहर रखने की नीति जारी रख सकती है।
भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी पहली कैबिनेट के गठन में कई विवादित और दागी विधायकों को शामिल नहीं किया, जबकि पार्टी के भीतर से इसके लिए काफी दबाव और लॉबिंग हो रही थी। सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व जनता को यह राजनीतिक संदेश देना चाहता था कि नई सरकार, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) शासन से अलग तरीके से काम करेगी।
शुक्रवार को कैबिनेट गठन के पहले चरण में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी समेत छह सदस्यों ने शपथ ली। शपथ लेने वालों में दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया, क्षुदिराम टुडू और पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री निशीथ प्रमाणिक शामिल थे।
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 44 मंत्री हो सकते हैं। ऐसे में भाजपा सरकार भविष्य में कैबिनेट विस्तार के दौरान अभी भी 38 और मंत्रियों को शामिल कर सकती है।
सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का मानना था कि गंभीर आरोपों या विवादित छवि वाले विधायकों को मंत्रालय में जगह नहीं दी जानी चाहिए, ताकि भाजपा मतदाताओं के बीच टीएमसी की छवि से स्पष्ट दूरी बना सके।
सूत्रों का कहना है कि शुक्रवार को शपथ लेने वाले मंत्रियों की पहली सूची में यही रणनीति दिखाई दी।
हालांकि, पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री निशीथ प्रमाणिक इस मामले में एक बड़ा अपवाद रहे। उनके खिलाफ चुनावी हलफनामे और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार लगभग 16 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराएं भी शामिल हैं। यह मुद्दा तब भी उठा था जब उन्हें पहले केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बनाया गया था।
भाजपा नेताओं ने प्रमाणिक का बचाव करते हुए कहा है कि ये मामले राजनीतिक प्रतिशोध के तहत दर्ज किए गए थे और तब लगाए गए जब उन्होंने टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थामा। पार्टी लगातार यह दावा करती रही है कि बंगाल में वर्षों तक चले राजनीतिक संघर्ष के दौरान विपक्ष में आने के बाद कई भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए।
सूत्रों ने बताया कि 4 मई को भाजपा की जीत के बाद कई नवनिर्वाचित विधायक मंत्री पद पाने के लिए सक्रिय रूप से लॉबिंग करने लगे और संगठन के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क कर कैबिनेट में शामिल किए जाने की मांग की।
सूत्रों के अनुसार, कुछ नामों पर कोलकाता स्तर पर संगठन में चर्चा हुई और अनौपचारिक मंजूरी भी दी गई थी, लेकिन अंतिम दौर की बैठकों में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन नामों को खारिज कर दिया।
बताया जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व का मानना था कि भ्रष्टाचार, उगाही, सिंडिकेट संबंधों या अन्य विवादों से जुड़े विधायकों को मंत्री बनाने से भाजपा की उस कोशिश को नुकसान पहुंचेगा, जिसके तहत वह राज्य में पहली बार सत्ता में आने के बाद टीएमसी से अलग शासन व्यवस्था की छवि बनाना चाहती है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि भाजपा समर्थकों, वैचारिक सहयोगियों और शुभचिंतकों जिनमें प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक भी शामिल हैं — की राय भी नेतृत्व तक पहुंचाई गई। कई लोगों का कहना था कि यदि पार्टी प्रधानमंत्री से जुड़ी अपनी भ्रष्टाचार-विरोधी छवि को बनाए रखना चाहती है, तो उसे “दागी” नेताओं को मंत्री बनाने से बचना चाहिए।
सूत्रों ने आगे बताया कि भविष्य में होने वाले कैबिनेट विस्तार में भी पार्टी विवादित चेहरों को मंत्रालय से बाहर रखने की कोशिश जारी रखेगी, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी व्यक्तिगत रूप से इस बात को लेकर गंभीर हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार किस तरह काम करती है।
भाजपा के भीतर बंगाल में मिली जीत को एक ऐतिहासिक राजनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इससे पहले पार्टी ने कभी राज्य में सरकार नहीं बनाई थी। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि बंगाल में पार्टी के प्रदर्शन के पीछे प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और उनका सीधा प्रचार अभियान मुख्य कारण रहा।
इसी वजह से, सूत्रों का कहना है कि यदि राज्य नेतृत्व के कुछ प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं को समायोजित करने के लिए दबाव या राजनीतिक मजबूरियां भी सामने आती हैं, तब भी प्रधानमंत्री मोदी सरकार में दागी चेहरों को शामिल करने के मामले में समझौता करने के पक्ष में नहीं होंगे।
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