आत्मतत्व की निकटता का महापर्व पर्युषण

पर्युषण दो शब्दों परि अर्थात् चारों तरफ से तथा उषण अर्थात् जलाना से बना है, अर्थात् अपने पूर्व में किए गए कर्मबंधों को नाना-नाना प्रकार से, चारों ओर से जलाना या उनके बंध को नष्ट करना साथ ही नए कर्मों से बंध नहीं हो, ऐसे सफल प्रयास करना I यह जैन धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, ऐसा कहा जा सकता है कि यह आत्मशुद्धि और आत्मोत्थान..

आत्मतत्व की निकटता का महापर्व पर्युषण
21-08-2025 - 12:40 PM
21-08-2025 - 06:15 PM

पर्युषण दो शब्दों परि अर्थात् चारों तरफ से तथा उषण अर्थात् जलाना से बना है अर्थात् अपने पूर्व में किए गए कर्मबंधों को नाना-नाना प्रकार से, चारों ओर से जलाना या उनके बंध को नष्ट करना साथ ही नए कर्मों से बंध नहीं हो, ऐसे सफल प्रयास करना। यह जैन धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, ऐसा कहा जा सकता है कि यह आत्मशुद्धि और आत्मोत्थान का वार्षिक महोत्सव है।

जैन धर्म में पर्युषण पर्व के रूप में अन्तर्मुखी होने, आध्यात्मिक उन्नति, आत्म शुद्धि और वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए अतिचारों [अशुभकर्मों] के प्रायश्चित पर एकाग्र करने के लिए समर्पित किया है। व्यक्ति सांसारिक क्रिया कलापों के समय बहिर्मुखी होकर अपने दैनिक जीवन में जाने-अनजाने में अनेक प्रकार के अशुभ कर्मों, लोभ-लालच, छल-कपट, निंदा-स्तुति तथा हिंसा-भाव आदि से सायास या अनायास बंध जाता है, जिन्हें सामान्य भाषा में कर्मबंध कहते हैं। जैसे कछुआ अपने सभी पैरों और गर्दन को समेट कर एकाग्र हो जाता है वैसे ही जैन धर्मावलम्बी इस पर्व के समय सभी सांसारिक प्रपंचों से यथाशक्ति दूर रहने का प्रयास करते हुए पूर्व के कर्मबंधों से मुक्ति के लिए अनथक प्रयास करते हैं।

वास्तव में कर्मों का बंधन आत्मोन्नति में सबसे बड़ी बाधा होते हैं। ऐसा नहीं है कि शुभ कर्मों का बंध नहीं होता है, शुभ कर्म भी हमें कर्मबंध से बांधते हैं क्योंकि शुभ कर्म किए तो भी उनके नैसर्गिक फलों को भोगने के लिए जन्म लेना ही होगा और अशुभ कर्मों के फलों को भोगने के लिए भी जन्म लेना ही होगा। जबकि मनुष्य जीवन का अन्तिम उद्देश्य या अभीष्ट है मुक्ति। जन्म-मरण से मुक्ति अथवा मोक्ष अथवा परमात्मा में लीन हो जाना। व्यक्त शब्द की उत्पत्ति के विषय में गीता में कहा गया है कि जब अव्यक्त ब्रह्म ने व्यक्त होने की इच्छा की और वे ही अनेक रूपों यथा जीव जगत, वनस्पति जगत, नदी, सरोवर, समुद्र, पहाड़ आदि के रूप में व्यक्त हुए हैं इसलिए जब कोई ब्रह्मज्ञानी या संत देह त्याग करते हैं तो कहा जाता है कि वे ब्रह्मलीन हो गए।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता में बारम्बार स्पष्ट सन्देश दिया है कि सभी कर्मों के फल का त्याग तत्काल अनन्त शान्ति प्रदान करता है। यही तो मोक्ष का दिव्य और अमोघ साधन पथ है। इसीलिये जैन और अजैन मंदिरों में परमात्मा की पूजा-अर्चना या प्रार्थना करते हुए अक्षत या चावल चढ़ाने की परम्परा है क्योंकि चांवल को बोया जाए तो वह अंकुरित नहीं होता है अर्थात् मनुष्य भगवान से प्रार्थना करता है कि मेरा भी पुनर्जन्म न हो।

श्वेताम्बर जैन आठ दिन और दिगम्बर जैन दस दिन का दश लक्षण पर्व मनाते हैं। भाद्रपद मास में वर्षाकाल होने से जैन साधू भगवंत किसी भी एक स्थान पर अपना वर्षावास करते हैं तो पर्युषण पर्व के समय धर्मावलम्बियों को आत्म दर्शन की साधना में उनका दिव्य सानिध्य, मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिल जाता है। आत्मोत्थान के इच्छुक जैनियों के लिए यह सोने में सुहागा जैसा होता है। इन दिनों अधिकांश जैन अपना व्यापार-व्यवसाय भी बंद रखते हैं ताकि स्वयं को पूरी तरह आत्म शुद्धि पर एकाग्र कर सकें। बाह्य तथा बाजारू खाद्य पदार्थों तथा संसाधनों पर कम से कम निर्भरता के चलते घर पर बना सादा, सुपाच्य, संयमित, सात्विक भोजन करते हैं। भोजन के प्रति आसक्ति तथा निर्भरता के त्याग की दृष्टि से कई जैन बिना नमक-मिर्च-शकर-घी-तेल का भोजन करते हैं। मूंग का सुपाच्य, निरापद, अत्यधिक पौष्टिक होने के कारण बहुतायत में उपयोग किया जाता है।

कई लोग एक दिन से लेकर एक माह तक निराहार मात्र जल का सेवन कर उपवास अर्थात् अपने पास या आत्मा के पास बैठने या वास करने का प्रयास भी करते हैं। पूजा अर्चना, स्वाध्याय, तप साधना, शास्त्रों का श्रवण, संतों के प्रवचन के साथ साथ सामायिक और प्रतिक्रमण भी करते हैं। सामायिक का अर्थ है, जहां हैं वही ठहर जाना। न तो पाप का बंध और न ही शुभ कर्मों का बंध तथा प्रतिक्रमण का अर्थ है पीछे लौटना। कर्म के बन्धनों को काटकर पुन: अपने मूल स्वरूप में लौटना।

पर्युषण के समय सुबह के प्रतिक्रमण को राय प्रतिक्रमण और रात के प्रतिक्रमण को देवसीय प्रतिक्रमण कहा जाता है। रात में सायास-अनायास हुए पापों-हिंसा का प्रायश्चित सुबह और दिनभर के पापों के कर्म बंधन से संध्याकालीन प्रतिक्रमण कर मुक्ति का प्रयास। वैसे धर्म निष्ठ जैन प्रतिदिन ही अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए दोनों समय का प्रतिक्रमण करते हैं और मन्दिर में पूजा-अर्चना तथा आरती करते हैं। आरती, जो कि ह्रदय का आर्तनाद है, करुण पुकार है, इसमें सांसारिक दुखों से मुक्ति के साथ-साथ जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति के लिए भी आर्तनाद किया जाता है।

कम से कम निर्भरता के तहत अनेक जैन धर्मावलम्बी पर्युषण के समय साधुओं की तरह ही रहते हैं और पौषध शाला में ही निवास करते हैं। सामान्य जैनी भोजन का एक कण भी जूठा नहीं डालते हैं और कम से कम पानी का उपयोग किया जाता हैनहाते समय भी साबुन का आवश्यकता होने पर ही उपयोग करते हैंसौन्दर्य प्रसाधनों का भी उपयोग नहीं किया जाता है। क्योंकि, इनसे नये पापों का बंध होता है I घर पर बनी सब्जियों का ही सेवन किया जाता हैजैसे मूंग बड़ीपापड़-मैथीदानाबेसनबेसन के  गट्टेकेर- सांगरीबहुत पहले से सुखाई गई हरी सब्जियां, ओडवा आदि का उपयोग किया जाता है। महिलाएं भी लिपस्टिक आदि से परहेज करती हैं क्योंकि इनमें पशु जन्य सामग्री अथवा घातक तथा अज्ञात रसायन हो सकती है। ईर्ष्यामोहनिंदाबैरभावक्रोध आदि से भाव हिंसा का दोष लगता है इसलिए ऐसे मनोभावों से बचा जाता है।

वैसे इन सबका वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार भी है। जैनियों के अपरिग्रह को जापान में न्युनतावाद के रूप में अपनाया गया है। कम से कम वस्तुओं पर निर्भरता को जापानी सुख और शान्ति का सबसे सार्थक तथा सटीक उपाय मानने लगे हैं। वैज्ञानिकों का भी कहना है कि अधिक सामग्री अर्थात् अधिक मोह और अधिक व्यस्तता। स्वयं के लिए कम समय। कम सामान कम देखरेखकम रखरखावकम गंदगी।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जैन धर्म का अपरिग्रह अद्भुत है। कुछ अध्ययनों से अपरिग्रह के अनुपम महत्त्व समझा जा सकता है।

  • फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के रॉय बाउमेस्टर के अनुसार कम कपड़ेसरल दिनचर्या रखने से मानसिक ऊर्जा बचती है।
  • कॉग्निटिव लोड थ्योरी के अनुसार साफ-सुथरा वातावरण ध्यान और समस्या-समाधान को बेहतर करता है।
  • घर में अधिक सामान → कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) बढ़ता है। मिनिमलिज़्म तनाव और चिड़चिड़ापन घटाता है।
  • शिकागो विश्वविद्यालय के मार्क बर्मन के अनुसार सरल व प्राकृतिक वातावरण मस्तिष्क को शांत करते हैं।
  • चॉइस का पैरेडॉक्स के अनुसार अत्यधिक विकल्प चिंता और असंतोष बढ़ाते हैं और कम विकल्पों से संतुष्टि बढ़ती है।
  • टिम कैसर (Knox College) ने पाया कि भौतिकवादी सोच → चिंता व अवसाद अधिक।
    मिनिमलिज़्म जीवन संतोष और लचीलापन बढ़ाता है।
  • सचेतनता: कम सामान से कम विचलन और उससे सजगता बढ़ती है। मन अधिक शांत और नियंत्रित रहता है।
  • सरल आहार और कम उपभोग मोटापाडायबिटीज व हृदय रोग से बचाते हैं।
  • कमरा साफ और उपकरण-मुक्त होने से नींद बेहतर होती है।

इसी आलेख के साथ मैं भरसक प्रयास करूंगा कि कम से कम आठ दिन सोश्यल मीडिया के माध्यम से होने वाले कर्मबन्धं से दूर रहूँ।

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डॉक्टर मनोहर भंडारी डॉक्टर मनोहर भंडारी चिकित्सक हैं और वे इंदौर के मेडिकल कॉलेज में अध्यापन करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे अपनी पैनी दृष्टि रखते हुए विभिन्न सामाजिक विषयों पर लंबे समय से लेखन कार्य भी करते रहे हैं।