SHANTI बिल क्या है, जिसे लोकसभा ने पास किया, और इसका इतना कड़ा विरोध क्यों हो रहा है?
लोकसभा ने बुधवार को एक अहम विधेयक पारित किया, जो भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन के तरीके को बुनियादी रूप से बदल सकता है। सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) बिल का उद्देश्य भारत के अब तक कड़े सरकारी नियंत्रण वाले असैन्य (सिविल) परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए..
नयी दिल्ली। लोकसभा ने बुधवार को एक अहम विधेयक पारित किया, जो भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन के तरीके को बुनियादी रूप से बदल सकता है। सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) बिल का उद्देश्य भारत के अब तक कड़े सरकारी नियंत्रण वाले असैन्य (सिविल) परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलना है।
यह विधेयक विपक्ष के वॉकआउट के बीच ध्वनि मत (वॉयस वोट) से पारित किया गया। विपक्षी दलों ने मांग की थी कि इसे विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जाए। वहीं सरकार ने इसे भारत के ऊर्जा भविष्य के लिए एक “मील का पत्थर” करार दिया।
SHANTI बिल क्या प्रस्ताव करता है?
SHANTI बिल के तहत निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी। इसमें केंद्र सरकार से लाइसेंस लेकर परमाणु बिजली संयंत्र स्थापित करना और उनका संचालन करना भी शामिल है।
अब तक भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी क्षेत्र के संस्थानों तक सीमित रहा है, जिसे परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 जैसे कानूनों के तहत नियंत्रित किया जाता रहा है।
सरकार का तर्क है कि यदि भारत को 2047 तक 100 गीगावॉट (GW) परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करना है, तो निजी निवेश अनिवार्य है। फिलहाल परमाणु ऊर्जा का योगदान देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में लगभग 3 प्रतिशत ही है।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह विधेयक भारत को वैश्विक मानकों और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के अनुरूप बनाता है। उनके अनुसार, जैसे-जैसे भारत की भू-राजनीतिक भूमिका बढ़ रही है, वैसे-वैसे उसे ऊर्जा उत्पादन में भी वैश्विक रणनीतियां अपनानी होंगी, खासकर तब जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है।
सरकार इसका समर्थन क्यों कर रही है?
सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सांसदों ने बहस के दौरान इस बिल का जोरदार समर्थन किया।
- बीजेपी सांसद शशांक मणि ने कहा कि इससे निवेश बढ़ेगा, रोजगार पैदा होंगे और देश ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनेगा।
- जद(यू) सांसद आलोक कुमार सुमन के अनुसार, यह बिल 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद करेगा और परमाणु ऊर्जा उत्पादन को लगभग दस गुना तक बढ़ा सकता है।
- तेदेपा सांसद कृष्ण प्रसाद तेनेटी ने कहा कि कई देश अपनी 50 प्रतिशत तक बिजली परमाणु ऊर्जा से पैदा करते हैं, जबकि भारत इस मामले में काफी पीछे है।
समर्थकों का यह भी कहना है कि भले ही निजी कंपनियों को प्रवेश दिया जाएगा, लेकिन सुरक्षा और रेडियोधर्मी सामग्री पर सरकार का नियंत्रण बना रहेगा।
विपक्ष इसका विरोध क्यों कर रहा है?
विपक्षी दलों ने इस विधेयक को खतरनाक, अधूरा और निजी व विदेशी कंपनियों के पक्ष में झुका हुआ बताया है।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सबसे तीखा विरोध करते हुए कहा कि यह बिल न्यूक्लियर डैमेज के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 के अहम प्रावधानों को कमजोर करता है। उनका कहना है कि अगर आपूर्तिकर्ता (सप्लायर) की जिम्मेदारी घटाई गई, तो किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में भारत को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
उन्होंने परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और 2010 के दायित्व कानून को खत्म करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया।
तिवारी ने यह भी कहा कि बिल में रेडियोधर्मी कचरे के निपटान को लेकर कोई स्पष्ट ढांचा नहीं है और यह भारत के दीर्घकालिक तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम की रीढ़ माने जाने वाले थोरियम और मोल्टन सॉल्ट रिएक्टरों की बजाय यूरेनियम आधारित रिएक्टरों को प्राथमिकता देता है।
शशि थरूर ने इसे “खतरनाक छलांग” क्यों कहा?
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बिल की सबसे कड़ी आलोचना करते हुए इसे “निजीकरण आधारित परमाणु विस्तार की खतरनाक छलांग” बताया।
उनका कहना था कि यह प्रस्तावित कानून अपवादों से भरा है, सरकार को अत्यधिक विवेकाधिकार देता है और जनहित के प्रति उदासीन है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह परमाणु विधेयक से ज्यादा एक “अस्पष्ट विधेयक” लगता है।
थरूर ने सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और पीड़ितों को न्याय मिलने पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बिल परमाणु ऊर्जा को “स्वच्छ और प्रचुर” बताता है, लेकिन रेडियोधर्मी रिसाव, लंबे समय तक खतरनाक बने रहने वाले परमाणु कचरे और भीषण दुर्घटनाओं के जोखिमों को नजरअंदाज करता है।
उन्होंने प्रस्तावित दायित्व सीमा करीब 46 करोड़ डॉलर (लगभग 3,910 करोड़ रुपये) को भी बेहद अपर्याप्त बताया और कहा कि फुकुशिमा और चेर्नोबिल जैसी आपदाओं में सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हुआ था।
अन्य प्रमुख आपत्तियां
- कई सांसदों ने सवाल उठाया कि क्या निजी कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र के बराबर सुरक्षा मानकों का पालन कर पाएंगी।
- शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत ने पूछा कि सरकार जवाबदेही का वही स्तर कैसे सुनिश्चित करेगी।
- तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत राय ने कहा कि परमाणु ऊर्जा स्वभाव से ही जोखिमपूर्ण है और दायित्व सीमा कम से कम 50 करोड़ डॉलर होनी चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत के पास पर्याप्त कच्चा माल नहीं है और यह बिल बिना पर्याप्त सुरक्षा के विदेशी निवेश का रास्ता खोलता है।
- समाजवादी पार्टी सांसद आदित्य यादव ने आरोप लगाया कि सरकार अमेरिकी और फ्रांसीसी कंपनियों के लिए “रेड कारपेट” बिछा रही है, जो ‘मेक इन इंडिया’ की भावना के खिलाफ है।
- डीएमके सांसद अरुण नेहरू ने ‘SHANTI’ नाम को ही विरोधाभासी बताया और जापान व रूस में हुई परमाणु दुर्घटनाओं का हवाला देते हुए चेतावनी दी।
SHANTI बिल को सरकार भारत की ऊर्जा जरूरतों और स्वच्छ भविष्य के लिए जरूरी सुधार मानती है, जबकि विपक्ष इसे सुरक्षा, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों के लिए गंभीर खतरा बता रहा है। यही वजह है कि यह विधेयक संसद और देश की राजनीति में तीखे टकराव का कारण बन गया है।
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