नेपाल तक रेल लाइन बिछाने की कोशिश में चीन, डर है कहीं श्रीलंका सा हश्र ना हो जाए नेपाल का
चीन के नेपाल के साथ संबंधों के मामले में हिमालय के दुर्गम पहाड़ हमेशा से ही रोड़ा बनते रहे हैं जबकि इसके विपरीत इस संदर्भ में भारत को अपनी भौगौलिक परिस्थिति का लाभ मिलता रहा है। नेपाल और भारत के बीच सड़क के जरिये सुगमता से आवाजाही होती रही है। आवागमन की सुलभता और नेपाल में बसी बहुसंख्यक हिंदू आबादी ने भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक संबंधों को और आगे बढ़ाने के काम किया है। यह बात चीन को नहीं सुहाती और इसीलिए वह भारत-नेपाल के संबंधों में बाधा उत्पन्न करने के प्रयास में रहा है
चीन कभी नेपाल को भ़ड़काता है भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर तो कभी यह जताकर वह भारत की अपेक्षा उसका बड़ा हितैशी है। भारत से मुकाबला करने के लिए वह भारत के पड़ोसी देशों को बरगलाने का काम कर रहा है। चीन कभी आर्थिक तौर पर कमजोर हो चुके पाकिस्तान में विकास की बात करके वहां निवेश के माध्यम से घुसने की कोशिश करता है तो कभी वह श्रीलंका में विकास के नाम पर बंदरगाह विकसित करने के बहाने से घुसता है।
नया समाचार अब नेपाल की ओर से आ रहा है कि भारत के साथ परोक्ष टक्कर लेने के लिए चीन अब नेपाल में रेललाइन बनाने की योजना पर काम कर रहा है। चीन और नेपाल दोनों की दशकों से इच्छा रही है कि बीजिंग अब काठमांडू तक रेललाइन बनाए लेकिन भौगोलिक परेशानियों के कारण चीन की हिमालय में अपनी रेल दौड़ाने की इच्छा पूरी नहीं हो पा रही है। चीन और नेपाल के बीच अब केवल 121 किलोमीटर रेललाइन बिछाई जानी है लेकिन यह चीन और नेपाल दोनों के लिए ही यह काम आसान नहीं है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने नेपाल के विदेश मंत्री के साथ मुलाकात में इस रेलवे लाइन के निर्माण के औचित्य का अध्ययन कराने को मंजूरी दे दी थी। चीन और नेपाल के बीच 121 किलोमीटर की दूरी में कई चुनौतियां हैं जिससे उन्हें निपटना होगा। यह रेलवे लाइन हिमालय से होकर गुजरेगी और तिब्बत के ग्यिरोंग से काठमांडू के बीच बनेगी। इस रेलमार्ग का 98 फीसदी हिस्सा सुरंगों और पुलों से भरा होगा। साथ ही इस पूरे इलाके में जटिल भौगालिक स्थितियों और संरक्षित क्षेत्रों का ध्यान रखना होगा।
यह ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि पूरा इलाका भूकंप के लिहाज से दुनिया के सबसे ज्यादा सक्रिय क्षेत्रों में आता है। चीन अगर यहां ट्रेन चलाने के लिए रेललाइन बनाना चाहता है तो उसे निर्माण के दौरान भूकंप के साथ, भूस्खलन, चट्टानों के गिरने, उच्च जमीनी तापमान और जल क्षरण जैसी चुनौतियों से निपटना होगा। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन भी चीन के लिए बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालय में बहुत तेजी से बर्फ पिघल रही है।
इसके अलावा पूरे रास्ते में करीब 80 फीसदी चढ़ाई या ढलान है। यदि यहां रेललाइन बिछा भी दी जाए तो रेलगाड़ी चला पाना बहुत टेढ़ी खीर साबित होगा। यही वहीं चीन को बेहद गरीब देश नेपाल तक ट्रेन चलाने के लिए अपना खजाना खोलना पड़ेगा। चीन को 1 किलोमीटर रेललाइन बनाने के लिए 3 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च करना पड़ेगा। यदि यह खर्च चीन ने नेपाल को कर्ज के तौर पर दिया तो कोई ताज्जुब नहीं कि उसका हश्र भी श्रीलंका जैसा ना हो जाए।
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