पाकिस्तान में किसकी बनेगी सरकार...! इमरान खान या गठबंधन, भारत के लिए इसके मायने?
<p>पाकिस्तान में चाहे कोई भी प्रधानमंत्री बने, भारत को आतंकवादियों को पनाह देने वाले इस समस्याग्रस्त पड़ोसी से तो निपटना ही होगा।</p>
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। इन हालात में सेना की पसंदीदा पार्टी को सत्ता संभालने के लिए गठबंधन करना पड़ा है। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के वफादार स्वतंत्र उम्मीदवारों ने चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया, जिससे सत्तारूढ़ सेना समर्थित पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज की बहुमत हासिल करने की संभावना कम हो गई। लेकिन इसके बाद देश में राजनीतिक हॉर्स ट्रेडिंग की स्थिति बन गई है।
चाहे कोई भी प्रधानमंत्री बने, भारत को आतंकवादियों को पनाह देने वाले इस समस्याग्रस्त पड़ोसी से तो निपटना ही होगा। हम देखेंगे कि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल पाकिस्तानी नेता भविष्य में भारत के साथ रिश्तों को कैसे संभालते हैं।
नवाज ने किए थे कुछ प्रयास
पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के प्रमुख नवाज शरीफ ने भारत के साथ संबंध सुधारने में गहरी रुचि जताई है। उनकी पार्टी के घोषणा पत्र में भारत को ‘शांति का संदेश’ देने का वादा किया गया है। हालांकि साथ में इसके लिए एक जरूरी शर्त भी शामिल की गई है कि भारत संविधान के आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने का फैसला वापस ले।
सत्ता का सफर आसान नहीं
नवाज शरीफ हाल ही में निर्वासन से लौटे हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच नए राजनयिक संबंधों की वकालत की है और भारत की प्रगति और वैश्विक उपलब्धियों को स्वीकार किया है। पीएमएल-एन ने 71 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि 266 सीटों वाली नेशनल असेंबली की 13 सीटों के परिणामों की घोषणा अभी बाकी है।
बिलावल ने दिखाई थी नकारात्मकता
पाकिस्तान की राजनीति में अहम स्थान रखने वाले भुट्टो परिवार के सदस्य और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता 35 वर्षीय बिलावल भुट्टो जरदारी एक समृद्ध राजनीतिक विरासत के साथ चुनावी मैदान में उतरे। बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल को त्रासदी और सत्ता संघर्षों से भरा पारिवारिक इतिहास विरासत में मिला है। भारत पर बिलावल भुट्टो-जरदारी का रुख अलग-अलग रहा है। रिश्तों को सामान्य बनाने की वकालत करते हुए उन्होंने अमेरिका में पीएम नरेंद्र मोदी पर काफी आलोचनात्मक टिप्पणियां भी की थीं।
इमरान चाहते थे ‘शांति का एक मौका’
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान ने साल 2019 में पीएम मोदी से ‘शांति का एक मौका देने’ के लिए कहा था। उन्होंने पुलवामा हमले के संबंध में खुफिया जानकारी पर कार्रवाई करने की इच्छा भी जताई थी। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जवान मारे गए थे। वर्ष 2021 में इमरान खान ने दोनों देशों के बीच युद्धविराम समझौते का स्वागत किया था। इसमें इस्लामाबाद की ओर से बातचीत के जरिए तत्परता से मुद्दों को हल करने पर जोर दिया गया। हालांकि, जून 2023 में उन्होंने भारत के साथ पारस्परिक संबंधों में प्रगति न होने की बात कही।
फिलहाल ये है पाकिस्तान का गणित
नेशनल असेंबली की 336 सीट में से 266 पर ही मतदान कराया जाता है लेकिन बाजौर में, हमले में एक उम्मीदवार की मौत हो जाने के बाद एक सीट पर मतदान स्थगित कर दिया गया था। अन्य 60 सीटें महिलाओं के लिए और 10 अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं और यह सीटें जीतने वाले दलों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर आवंटित की जाती हैं। नई सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को 265 सीट में से 133 सीट जीतनी होंगी।
निर्दलीयों ने जीती सर्वाधिक सीटें
पाकिस्तान निर्वाचन आयोग के अनुसार, नेशनल असेंबली की 250 सीटों पर मतगणना पूरी हो चुकी है और निर्दलीय उम्मीदवारों ने सर्वाधिक 99 सीट जीती हैं। इनमें से अधिकतर उम्मीदवार इमरान खान की पार्टी ‘तहरीक-ए-इंसाफ’ द्वारा समर्थित हैं। पाकिस्तान की राजनीति में सेना का दबदबा है। सन 1947 में भारत से विभाजन के बाद के पाकिस्तान के इतिहास में करीब आधे समय जनरलों ने देश चलाया है।
What's Your Reaction?