शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥

जहां प्रकाश आता है, वहां से अंधकार चला जाता है और जहां से अंधकार जाता है, वहां मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं, सर्वत्र शुभ हो जाता है। जहां सर्वत्र शुभ होता हैं, वहां आरोग्य के साथ धनसंपदा आती ही है जो वातावरण और मन से अनैतिक भावनाओं व नकात्मक शक्ति को नष्ट करते हैं। जीवन में जब हम ऐसे ही दीपक को प्रज्ज्वलित करते हैं...

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
29-10-2024 - 02:52 PM

जहां प्रकाश आता है, वहां से अंधकार चला जाता है और जहां से अंधकार जाता है, वहां मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं, सर्वत्र शुभ हो जाता है। जहां सर्वत्र शुभ होता हैं, वहां आरोग्य के साथ धनसंपदा आती ही है जो वातावरण और मन से अनैतिक भावनाओं व नकात्मक शक्ति को नष्ट करते हैं। जीवन में जब हम ऐसे ही दीपक को प्रज्ज्वलित करते हैं जिससे सभी प्रकार के शत्रु भाव का नाश हो जाता है। यह भारतीय पूर्वजों का जीवन दर्शन है और इसीलिए कहा गया है..

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा ।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥

एक दीपक पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित कर देता है और इसी भावना से प्रेरित भारतीय संस्कृति में सबसे अधिक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण पर्व है दीपोत्सव यानी दीपावली। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली विजय यात्रा का प्रतीक है। यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को भारत में अनेक धर्मों और सभी वर्गों द्वारा खुशी के साथ मनाया जाता है। इस पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत कार्तिक कृष्ण पक्ष की धनतेरस से होती है जो कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की दूज तक रहती है। इस महापर्व में प्रत्येक दिन का विशेष महत्व है और हर दिन अलग-अलग देवी-देवताओं का पूजन किया जाता है।

धनतेरस

धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहते हैं। यह कार्तिक मास की अमावस्या के 2 दिन पूर्व मनाया जाता है। इसे भगवान धन्वन्तरी की जयंती के साथ धनतेरस के रूप में भी मनाते हैं। हिन्दू परंपराओं और मान्यता के अनुसार समुंद्र मंथन के समय अनेक वस्तुओं के साथ भगवान धन्वन्तरी अमृत कलश के तौर पर आयुर्वेद ज्ञान का भंडार लेकर प्रगट हुए थे। आज भी आयुर्वेद से जुड़े लोग भगवान धन्वन्तरी की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। उनके पूजन से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

इसी तरह कहा जाता है कि भगवान शिव ने देवताओं के धन की रक्षा की जिम्मेदारी कुबेर जी को सौंपी थी। भगवान कुबेर ने हमेशा ही देवताओं के धन को सुरक्षित रखा इसीलिए उन्हें धनाध्यक्ष भी कहा जाता है। धनतेरस को भगवान कुबेर की पूजा की जाती है और उन्हें अपना धन यानी धातु के नये बर्तन, आभूषण, नकदी आदि समर्पित की जाती है ताकि वे उनकी निरंतर सुरक्षा रखें। धनसंपदा कभी समाप्त ना हो।

नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी

पांच दिवसीय महापर्व का मुख्य पर्व दीपावली है और इससे एक दिन पूर्व कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को छोटी दीपावली या नरक चतुर्दशी पर्व कहते हैं। इस दिन को पर्व के रूप में मनाने का मंतव्य है कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वर्ग, नरक और मोक्ष का ध्यान रखते हुए सत् मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। इस दिन रूप निखारने का भी पर्व भी माना गया है। जिन परिवारों में किसी व्यक्ति की मौत के कारण दीपावली नहीं मनाई जाती है, वे इस दिन को दीपावली के रूप में मनाते हैं और लक्ष्मी पूजन करके सौभाग्य और समृद्धि में वृद्धि की कामना करते हैं।

दीपावली

कार्तिक मास की अमावस्या को प्रभु श्रीराम माता सीता का हरण करने वाले रावण का वध कर लंका से अयोध्या लौटे थे। इसी प्रसन्नता में उनकी प्रजा ने दीपों की अवलि यानी पंक्तियां लगा दीं। हम भी प्रभु राम की ही प्रजा हैं और परंपरानुसार उनकी लंका पर विजय के बाद अयोध्या लौटने वादे दिन को आज तक दीपोत्सव के रूप में मनाते हैं। माता सीता के हरण के बाद प्रभु श्रीराम के जीवन में अंधियारा छाया था और उन्होंने इस अधियारे को अपने पराक्रम के प्रकाश से उज्ज्वल किया। हम लोग भी जीवन के दारिद्रय रूपी अंधकार से बाहर निकलें। अंधकार पर प्रकाश की विजय प्राप्त करें, इसी कामना से दीपावली का महापर्व मनाते हैं। इस दिन हम बुद्धिदाता भगवान गणेश और दरिद्रता दूर करने वाली मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए उनका विशेष पूजन करते हैं। हम कामना करते हैं कि भगवान गणेश जी हमें ऐसा विवेक दें कि हम मां लक्ष्मी के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त होने वाले धन का अपव्यय ना करें और समाज के हित में उसका सदुपयोग कर सकें। अपना जीवन निरंतर उन्नति की ओर ले जाएं।

गोवर्धन पूजा

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को हम गोवर्धन पूजा यानी भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का दिन मानते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम गोवर्धन भी है। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया और यह वरदान दिया जब तक गोवर्धन की पूजा होती रहेगी तब तक  वे लोगों की रक्षा करते रहेंगे। इसीलिए इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। इस दिन तक मंडियों में नई सब्जियां आने लगती हैं। ऐसे में उन विभिन्न सब्जियों की एक मिश्रित सब्जी बनाई जाती है और इसके साथ भगवान को छप्पन भोग बनाकर भेंट किया जाता है। उसमें से प्रसाद वितरित किया जाता है।

भैया दूज

कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष द्वितीया को भैया दूज कहा जाता है। इस दिन बहिनें अपने भाइयों के मस्तक पर तिलक लगाती हैं। माना जाता है कि इस दिन धर्मदेव यमराज अपनी बहन यामी के घर जाते हैं। उन दोनों ने अपने समय से ही भाई-बहिन के स्नेह बंधन को मजबूत किया है। इस दिन जब यामी ने धर्मराज के मस्तक पर तिलक लगाया तो उन्होंने इस स्नेह भाव से प्रसन्न होकर कहा कि आज यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जिस भी व्यक्ति के मस्तक पर स्नेहसिक्त बहन द्वारा तिलक लग जाएगा, उसे संसार में कभी कोई बाधा ही नहीं आएंगी और अकाल मृत्यु भी नहीं होगी। इसके बाद से ही दीपावली के बाद कार्तिक मास की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि पर बहिनों द्वारा भाइयों के मस्तक पर तिलक की परंपरा चली आ रही है।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।