270 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण का दबाव, ईरान को बातचीत की ओर धकेल सकता है
ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों से हुए भारी नुकसान की भरपाई में वर्षों लग सकते हैं, जिससे तेहरान पर आगामी वार्ताओं में प्रतिबंधों में राहत पाने के लिए समझौता करने का दबाव बढ़ गया है। ईरानी नेतृत्व भले ही मौजूदा युद्धविराम को एक बड़ी जीत बता रहा हो लेकिन अंदरखाने उसे भारी पुनर्निर्माण लागत का सामना करना..
ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों से हुए भारी नुकसान की भरपाई में वर्षों लग सकते हैं, जिससे तेहरान पर आगामी वार्ताओं में प्रतिबंधों में राहत पाने के लिए समझौता करने का दबाव बढ़ गया है। ईरानी नेतृत्व भले ही मौजूदा युद्धविराम को एक बड़ी जीत बता रहा हो लेकिन अंदरखाने उसे भारी पुनर्निर्माण लागत का सामना करना पड़ रहा है।
पांच सप्ताह तक चले युद्ध के दौरान अमेरिका और इज़राइल ने ईरान में कम से कम 17,000 ठिकानों को निशाना बनाया। इनमें फैक्ट्रियां, बंदरगाह, रेल लाइनें, सड़कें, सरकारी इमारतें और सैन्य ठिकाने शामिल हैं। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार पुनर्निर्माण की लागत करीब 270 अरब डॉलर आंकी गई है, हालांकि स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि सटीक आंकड़ा अभी तय करना जल्दबाजी होगी।
इन हमलों का उद्देश्य ईरान की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को कमजोर करना था। केवल बुनियादी ढांचे को ही नहीं, बल्कि स्टील प्लांट, पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स और विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाले उद्योगों को भी निशाना बनाया गया।
यह नुकसान ऐसे समय में हुआ है जब ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर संकट में थी। नए साल के आसपास महंगाई, गिरती मुद्रा और आर्थिक तंगी के कारण बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की विशेषज्ञ बुर्कू ओज़चेलिक के अनुसार, “अगर वाशिंगटन प्रतिबंधों में राहत नहीं देता, तो ईरान को गंभीर आर्थिक तबाही का सामना करना पड़ सकता है।” इससे सरकार की स्थिरता भी खतरे में पड़ सकती है।
इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता का पहला दौर बिना किसी समझौते के समाप्त हुआ, लेकिन दोनों पक्षों ने समझौते की कुछ संभावनाएं जताई हैं, खासकर यूरेनियम संवर्धन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर। जल्द ही दूसरे दौर की वार्ता होने की उम्मीद है।
इस बार का विनाश पिछले साल के 12 दिन के युद्ध से कहीं ज्यादा व्यापक है। हमले शहरी इलाकों और प्रमुख आर्थिक केंद्रों तक पहुंचे। इज़राइली हमलों में बंदर इमाम पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, इस्फहान और खुज़ेस्तान के स्टील संयंत्रों के साथ-साथ दवा फैक्ट्रियों को भी नुकसान पहुंचा।
ये सेक्टर ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं। पेट्रोकेमिकल उद्योग देश के गैर-तेल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा है, जिससे सालाना करीब 18 अरब डॉलर की कमाई होती है, जबकि स्टील उद्योग लगभग 7 अरब डॉलर का योगदान देता है। इन पर हमले कर बेंजामिन नेतन्याहू के अनुसार “आईआरजीसी की कमाई की मशीन” को कमजोर करने की कोशिश की गई।
अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अनुमान के अनुसार, ईरान को रोजाना लगभग 435 मिलियन डॉलर का निर्यात नुकसान हो रहा है, जो मुख्य रूप से तेल और पेट्रोकेमिकल से जुड़ा है। अगर यह स्थिति जारी रही, तो ईरान को कुछ ही हफ्तों में तेल उत्पादन घटाना पड़ सकता है।
आर्थिक और मानवीय प्रभाव अब साफ दिखने लगे हैं। फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, सप्लाई चेन टूट चुकी हैं और अर्थशास्त्री हादी काहलजादेह के अनुसार करीब 1.2 करोड़ नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं।
आम लोग भी इसका असर झेल रहे हैं..नौकरी छूटना, खाद की कमी और रोजमर्रा की परेशानियां बढ़ गई हैं। हालांकि सरकार के भंडार के चलते सुपरमार्केट में जरूरी सामान उपलब्ध रहा, लेकिन लोगों का सरकार पर भरोसा कम होता जा रहा है और कई लोग देश छोड़ने पर विचार कर रहे हैं।
पुनर्निर्माण की राह बेहद कठिन है। ईरान के पास मजबूत औद्योगिक आधार और तेल-गैस संसाधन जरूर हैं, लेकिन जन असंतोष, बैंकिंग संकट और इंटरनेट बंदी जैसी समस्याएं हालात को और जटिल बना रही हैं।
ऐसे में तेहरान के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को संभालना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है और यही दबाव उसे अमेरिका के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर सकता है।
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