CJI सूर्यकांत का सवाल—क्या अमेरिकी अदालतें भारतीय अदालतों के साथ समान व्यवहार करेंगी? फाइज़र याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अमेरिकी दवा कंपनी फाइज़र (Pfizer) के आग्रह पर अमेरिका की एक अदालत द्वारा जारी लेटर्स रोगेटरी (Letters Rogatory) को लागू करने को लेकर गंभीर आपत्ति जताई। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि भारत अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा और यह भी सवाल उठाया कि क्या विदेशों में, खासकर अमेरिका में, भारतीय अदालतों की ओर से भेजे गए ऐसे अनुरोधों को समान सम्मान और व्यवहार मिलता है या..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अमेरिकी दवा कंपनी फाइज़र (Pfizer) के आग्रह पर अमेरिका की एक अदालत द्वारा जारी लेटर्स रोगेटरी (Letters Rogatory) को लागू करने को लेकर गंभीर आपत्ति जताई। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि भारत अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा और यह भी सवाल उठाया कि क्या विदेशों में, खासकर अमेरिका में, भारतीय अदालतों की ओर से भेजे गए ऐसे अनुरोधों को समान सम्मान और व्यवहार मिलता है या नहीं।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की दो-न्यायाधीशों की पीठ फाइज़र की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कंपनी ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अमेरिकी अदालत द्वारा जारी लेटर्स रोगेटरी को लागू करने से इनकार कर दिया गया था।
फाइज़र ने चेन्नई स्थित सॉफ्टजेल हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े दस्तावेज़ों और गवाहियों को हासिल करने के लिए यह अनुरोध किया था। यह मामला कथित पेटेंट उल्लंघन विवाद से जुड़ा है।
‘एकतरफा सहयोग स्वीकार्य नहीं’
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सहयोग में एकतरफा रवैये पर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “जब आपको जानकारी चाहिए होती है, तो आप दुनिया के किसी भी हिस्से से जानकारी हासिल करना चाहते हैं। लेकिन जब आपसे जानकारी मांगी जाती है, तो आप अपनी श्रेष्ठता दिखाने लगते हैं। यही असली समस्या है।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में नोटिस जारी करने का मतलब यह नहीं है कि अदालत फाइज़र की दलीलों से सहमत है।
CJI ने कहा, “ऐसा नहीं है कि हम इसलिए नोटिस जारी कर रहे हैं क्योंकि हम आपकी दलीलों से संतुष्ट हैं। हम नोटिस किसी और उद्देश्य से जारी कर रहे हैं। आपको यह बात बिल्कुल साफ समझनी चाहिए कि हम अपने देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेंगे।”
फाइज़र की दलील: पारस्परिकता का सिद्धांत
फाइज़र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित सिब्बल ने दलील दी कि लेटर्स रोगेटरी का पालन पारस्परिकता (Reciprocity) और अंतरराष्ट्रीय सौहार्द (International Comity) के सिद्धांत पर आधारित होता है। उनके अनुसार, जब भारत की अदालतें ऐसे अनुरोध भेजती हैं, तो अन्य देशों की अदालतें भी सामान्यतः सकारात्मक प्रतिक्रिया देती हैं।
हालांकि, CJI ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए पूछा, “आप पारस्परिकता की बात सिर्फ हेग कन्वेंशन के आधार पर कर रहे हैं। सवाल यह है कि वे (विदेशी अदालतें) वास्तव में इसका पालन किस हद तक करती हैं?”
इसके जवाब में अमित सिब्बल ने कहा कि यह व्यवस्था “दोनों पक्षों द्वारा सम्मानित की जानी चाहिए” और उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि फाइज़र ऐसे उदाहरण पेश करेगी, जिनसे यह साबित हो सके कि विदेशी अदालतों ने भारतीय अदालतों के अनुरोधों पर कार्रवाई की है।
उन्होंने कहा, “हम उदाहरण लेकर आएंगे… भारत में भी हमने इसी पारस्परिकता के सिद्धांत के तहत इसका पालन किया है।”
अदालतों के बीच सौहार्द और परस्पर सम्मान
सीजेआई सूर्यकांत ने भारत के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय अदालतें ऐसे अनुरोध किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि सिद्धांतों के आधार पर स्वीकार करती हैं।
उन्होंने कहा, “भारत में हम इसलिए पालन करते हैं क्योंकि हम अदालतों के बीच सौहार्द में विश्वास रखते हैं। हम परस्पर सम्मान में विश्वास करते हैं और दूसरे देश की संप्रभुता का भी सम्मान करते हैं।”
फाइज़र की यह अपील मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ी है, जिसमें अमेरिकी अदालत के साक्ष्य जुटाने संबंधी अनुरोध में सहायता देने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही नोटिस जारी कर मामले के व्यापक पहलुओं की जांच करने पर सहमति जताई हो, लेकिन उसने साफ संकेत दिया है कि राष्ट्रीय संप्रभुता और वास्तविक पारस्परिकता के सवाल इस मामले में केंद्र में रहेंगे।
अब इस मामले की आगे सुनवाई होगी, जिसमें फाइज़र को यह दिखाने के लिए सामग्री पेश करनी होगी कि विदेशी अदालतें और प्राधिकरण भारतीय न्यायिक अनुरोधों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं।
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