मनरेगा की जगह G RAM G बिल लाने की तैयारी; विपक्ष बोला—‘गांधी नाम हटाने का क्या औचित्य?’
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा) की जगह एक नए ढांचे को लाने का प्रस्ताव किया है। यह नया ढांचा विकसित भारत—गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) या ‘VB—G RAM G बिल, 2025’ के नाम से प्रस्तावित..
नयी दिल्ली। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा) की जगह एक नए ढांचे को लाने का प्रस्ताव किया है। यह नया ढांचा विकसित भारत—गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) या ‘VB—G RAM G बिल, 2025’ के नाम से प्रस्तावित है।
प्रस्तावित कानून का उद्देश्य ग्रामीण रोजगार नीति को सरकार के दीर्घकालिक दृष्टिकोण विकसित भारत @2047 के अनुरूप पुनर्संरेखित करना है। इसके साथ ही, मौजूदा योजना की संरचना और फंडिंग पैटर्न में भी बदलाव किए जाने का प्रस्ताव है।
इस कदम के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं ने महात्मा गांधी का नाम हटाने के पीछे सरकार की “मंशा” पर सवाल उठाए हैं।
प्रस्तावित G RAM G बिल में क्या कहा गया है
ड्राफ्ट बिल के अनुसार, नया कानून “विकसित भारत @2047 के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप ग्रामीण विकास का ढांचा” स्थापित करने का लक्ष्य रखता है। इसके तहत हर ग्रामीण परिवार, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम के लिए स्वेच्छा से काम करना चाहते हैं, को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी दी जाएगी।
बिल में सशक्तिकरण, समन्वय (कन्वर्जेंस) और संतृप्ति (सैचुरेशन) पर जोर दिया गया है, ताकि “समृद्ध और सुदृढ़ ग्रामीण भारत” का निर्माण किया जा सके।
G RAM G योजना को केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में लागू किया जाएगा, जबकि मनरेगा पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित थी। नए प्रस्ताव के तहत राज्यों और विधानसभाओं वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए केंद्र–राज्य फंड शेयरिंग अनुपात 60:40 होगा। हालांकि, उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों और उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 90:10 का अनुपात रखा गया है।
मनरेगा के तहत अकुशल श्रमिकों की मजदूरी पूरी तरह केंद्र सरकार द्वारा दी जाती थी। नए बिल के तहत राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा और पहली बार कृषि मौसम के दौरान VB G RAM G से जुड़े कार्यों पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान किया गया है।
यह बिल योजना की प्रशासनिक संरचना में भी बदलाव करता है। जहां मनरेगा का क्रियान्वयन सीधे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा किया जाता था, वहीं नए कानून के तहत हर राज्य में राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद के गठन का प्रावधान है, जो योजना के क्रियान्वयन की निगरानी और समीक्षा करेगी।
मनरेगा के नाम बदलने पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने सोमवार को योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाने के पीछे सरकार की मंशा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि किसी भी योजना का नाम बदलने पर कार्यालयों और स्टेशनरी में कई प्रशासनिक बदलाव करने पड़ते हैं, जिससे अतिरिक्त खर्च होता है। उन्होंने सवाल किया कि इससे आखिर क्या लाभ होता है।
इस कदम के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए प्रियंका ने कहा, “महात्मा गांधी का नाम क्यों हटाया जा रहा है? महात्मा गांधी न सिर्फ देश में बल्कि पूरी दुनिया में सबसे महान नेताओं में माने जाते हैं। ऐसे में उनका नाम हटाने का उद्देश्य क्या है, मैं सच में समझ नहीं पा रही हूं। सरकार की मंशा क्या है
कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने कहा कि यह कदम गांधी विरासत के प्रति शत्रुता को दर्शाता है। उन्होंने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार इसका नाम बदल रही है। ऐसा लगता है कि उन्हें गांधी नाम से नफरत है। यह फैसला महात्मा गांधी और उनकी विचारधारा में विश्वास रखने वालों की भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा।”
राजद नेता मनोज झा ने कहा, “मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि हमें प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सामने क्यों झुकना चाहिए।” उन्होंने आगे कहा कि नाम बदलकर योजना की आत्मा को ही नष्ट किया जा रहा है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए सुझाव दिया कि इसका नाम ‘पूज्य बापू योजना’ रख दिया जाए और यह दावा कर दिया जाए कि बेरोजगारी खत्म हो गई है।
प्रियंका गांधी की टिप्पणियों का जवाब देते हुए भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि सरकार की मंशा केवल प्रतीकात्मक नहीं है। उन्होंने कहा,“प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ नाम नहीं बदल रहे हैं बल्कि उसके पीछे की भावना को बदल रहे हैं।”
वाम दलों ने ‘लागत हस्तांतरण’ और अधिकारों के नुकसान का मुद्दा उठाया
एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक लंबी पोस्ट में, सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि प्रस्तावित कानून केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है बल्कि यह मनरेगा की अधिकार-आधारित प्रकृति को मूल रूप से बदल देता है।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाना तो “सिर्फ ट्रेलर” है। उनका आरोप है कि सरकार ने कानूनी रोजगार गारंटी को एक सशर्त, केंद्र-नियंत्रित योजना से बदल दिया है, जिससे राज्यों और श्रमिकों को नुकसान होगा।
उनका कहना था कि राज्यों को सामूहिक रूप से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, जबकि अकेले केरल पर 2,000–2,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आएगा। उन्होंने इसे “चुपचाप लागत का हस्तांतरण” बताते हुए कहा कि यह सुधार नहीं बल्कि संघीय जिम्मेदारी से पीछे हटने का कदम है।
दोनों योजनाओं की तुलना करते हुए ब्रिटास ने कहा कि मनरेगा मांग-आधारित थी, जहां यदि कोई श्रमिक काम मांगता था तो केंद्र सरकार को भुगतान करना होता था। इसके विपरीत, नया ढांचा पूर्व-निर्धारित आवंटन और सीमाओं के तहत काम करेगा यानी “जब फंड खत्म, तो अधिकार भी खत्म।”
अपनी आलोचना का निष्कर्ष निकालते हुए ब्रिटास ने कहा कि नई योजना का मतलब है..“
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