EC को SIR संचालित करने का अधिकार; खामियां होंगी तो सुधारेंगे: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग (EC) को पूरे देश में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) करने का वैधानिक और संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि वह इस प्रक्रिया को रोकने का कोई आदेश नहीं देगा लेकिन यदि किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो उचित सुधारात्मक कदम जरूर..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग (EC) को पूरे देश में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) करने का वैधानिक और संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि वह इस प्रक्रिया को रोकने का कोई आदेश नहीं देगा लेकिन यदि किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो उचित सुधारात्मक कदम जरूर उठाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने SIR की उचितता पर उठे सवालों को खारिज करते हुए कहा कि मतदाता सूची अद्यतन करने की प्रक्रिया—जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से और भी सुव्यवस्थित हुई—उसके खिलाफ “एक भी आपत्ति” दाखिल नहीं की गई।
कपिल सिब्बल ने जताई चिंता: फ़ॉर्म भरने में मुश्किल, बहिष्करण का खतरा
आरजेडी सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने SIR की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत में लाखों लोग अशिक्षित हैं और वे मतदाता पंजीकरण फ़ॉर्म भरने में सक्षम नहीं होते। ऐसे फ़ॉर्म भरना उनके लिए बहिष्करण का उपकरण बन जाता है।
उन्होंने तर्क दिया, “आखिर एक मतदाता को यह फ़ॉर्म भरने की आवश्यकता ही क्यों हो? EC कौन होता है यह तय करने वाला कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं? आधार कार्ड में पता और जन्म तिथि दोनों होते हैं; 18 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति केवल स्वयं-घोषणा देकर मतदाता क्यों नहीं बन सकते?"
CJI का जवाब: ग्रामीण भारत में मतदाता जागरूकता अधिक
CJI ने सिब्बल के तर्कों का जवाब देते हुए कहा, “सिब्बल, आपने दिल्ली में चुनाव लड़े हैं, जहां कई लोग वोट नहीं डालते। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव एक त्योहार की तरह होते हैं। वहां हर व्यक्ति को जानकारी होती है कि गांव का कौन निवासी है और कौन नहीं।”
2012–2014 का संदर्भ: मतदाता संख्या वयस्क आबादी से अधिक
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अतीत में मतदाता सूची में गड़बड़ियां हुई थीं। उन्होंने कहा, “रिकॉर्ड में है कि 2012 और 2014 में मतदाताओं की संख्या कुल वयस्क आबादी से अधिक थी। क्या मतदाता सूची को ठीक करना आवश्यक नहीं है? यदि EC को किसी की नागरिकता पर संदेह है, तो क्या उसे जांच करने का अधिकार नहीं?”
बिहार का उदाहरण: ज़मीन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं
CJI ने कहा कि बिहार में SIR को लेकर शुरू में “करोड़ों नाम हटाए जाने” की आशंका जताई गई थी, लेकिन कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद प्रक्रिया सुव्यवस्थित हुई।
उन्होंने कहा, “अंततः जो नाम हटे, वे अधिकतर मृतक या बाहर जा चुके लोग थे। किसी ने आपत्ति नहीं की। और ज़मीन पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं दिखा।”
सिब्बल ने रणनीति बदली, कहा—नागरिकता साबित करने का बोझ मतदाता पर क्यों?
बहस के आगे बढ़ने पर सिब्बल ने मुख्य मुद्दे पर ज़ोर दिया—
- प्रक्रिया समावेशी होनी चाहिए
- नागरिकता साबित करने का बोझ मतदाता पर नहीं डाला जा सकता
- यदि कोई “संदिग्ध मतदाता” है तो मामला सक्षम प्राधिकरण को भेजा जाए
- बूथ लेवल अधिकारी (BLO) को नागरिकता की जांच का अधिकार नहीं होना चाहिए
कब होगी अगली सुनवाई?
मामले की बहस गुरुवार को भी जारी रहने वाली है।
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