यूजीसी नियमों पर विवाद: जाति के आधार पर अलग हॉस्टल? CJI का कड़ा रुख, बोले कि ‘भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए’

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नई इक्वैलिटी रेगुलेशंस 2026 में किए गए कुछ प्रावधानों पर गंभीर चिंता जताई। विशेष रूप से उस प्रस्ताव पर सवाल उठाए गए, जिससे छात्रों के लिए जाति के आधार पर अलग-अलग हॉस्टल बनाए जाने की स्थिति उत्पन्न हो..

यूजीसी नियमों पर विवाद: जाति के आधार पर अलग हॉस्टल? CJI का कड़ा रुख, बोले  कि ‘भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए’
30-01-2026 - 11:06 AM

नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नयी इक्वैलिटी रेगुलेशंस 2026 में किए गए कुछ प्रावधानों पर गंभीर चिंता जताई। विशेष रूप से उस प्रस्ताव पर सवाल उठाए गए, जिससे छात्रों के लिए जाति के आधार पर अलग-अलग हॉस्टल बनाए जाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ यूजीसी के इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जाति आधारित हॉस्टल की आशंका पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए CJI ने कहा, “यह कैसी बात हो रही है? हम सबने हॉस्टलों में साथ रहकर पढ़ाई की है और आज तो अंतर-जातीय शादियां भी हो रही हैं।”

भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए’: CJI

प्रस्ताव के पीछे की मंशा पर सवाल उठाते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे कदम दशकों की सामाजिक प्रगति को पीछे धकेल सकते हैं। CJI ने कहा, “भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए। देशभर में अब अंतर-जातीय शादियां हो रही हैं और हम भी ऐसे समय में पढ़े हैं, जब हर जाति के छात्र एक साथ हॉस्टलों में रहते थे।”

उन्होंने आगे जोड़ा, “75 वर्षों में हमने एक वर्गहीन समाज की दिशा में जो उपलब्धियां हासिल की हैं, क्या हम अब जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर पीछे की ओर जा रहे हैं?”

नियमों की धारा 3(c) को चुनौती

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बताया कि उनकी मुख्य आपत्ति यूजीसी नियमों की धारा 3(c) पर है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित है।

उन्होंने दलील दी कि भेदभाव केवल इन्हीं वर्गों तक सीमित नहीं है और धारा 3(e) में पहले से ही भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा मौजूद है। ऐसे में धारा 3(c) अनावश्यक है और समाज में विभाजन पैदा करती है।

इस पर CJI ने कहा कि अदालत यह जांच कर रही है कि क्या ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14, जो समानता की गारंटी देता है, के अनुरूप हैं या नहीं।

क्षेत्रीय भेदभाव का मुद्दा भी उठा

पीठ ने क्षेत्र और संस्कृति के आधार पर होने वाले भेदभाव पर भी चर्चा की। CJI ने टिप्पणी की कि कॉलेजों में उत्पीड़न का एक सबसे खराब रूप यह होता है कि दक्षिण भारत या उत्तर-पूर्व से आए छात्रों का उनकी संस्कृति को लेकर मज़ाक उड़ाया जाता है।

उन्होंने सवाल किया कि क्या धारा 3(e) ऐसे मामलों को भी कवर करती है जैसे दक्षिण भारतीय छात्र अगर उत्तर भारत में पढ़ते हैं (या इसके उलट) और उन्हें अनुचित टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। याचिकाकर्ता के वकील ने इसका उत्तर हां में दिया।

नियमों में रैगिंग का जिक्र क्यों नहीं?

एक अन्य वकील ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि इन नियमों में रैगिंग का कोई उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र के साथ अनुसूचित जाति से जुड़े सीनियर्स रैगिंग करते हैं, तो उसे इन नियमों के तहत कोई उपाय नहीं मिलेगा जबकि भेदभाव के आरोपों का दुरुपयोग किया जा सकता है।

इस पर CJI ने सवाल उठाया कि यूजीसी नियमों में रैगिंग को क्यों शामिल नहीं किया गया और यह मान्यता क्यों बनाई गई कि कॉलेजों में भेदभाव केवल जाति तक ही सीमित है। अदालत ने कहा कि अक्सर उत्पीड़न सीनियर-जूनियर के पदानुक्रम से जुड़ा होता है और यह लगभग हर संस्थान में देखने को मिलता है।

केंद्र से विवादित प्रावधानों पर जवाब तलब

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को संबोधित करते हुए अदालत ने कहा कि फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाई जा रही है। कोर्ट ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा कि जब भेदभाव की एक सामान्य परिभाषा पहले से मौजूद है, तो जाति आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने की जरूरत क्यों पड़ी और रैगिंग को नियमों से बाहर क्यों रखा गया।

CJI ने कहा कि अदालत यह देखना चाहती है कि क्या विवादित प्रावधानों को और अधिक समावेशी और निष्पक्ष तरीके से दोबारा तैयार किया जा सकता है।

यूजीसी इक्वैलिटी रेगुलेशंस 2026 क्या हैं?

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को इक्वैलिटी रेगुलेशंस 2026 अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करना है। ये नियम देश के सभी विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं और इनके साथ एक विस्तृत क्रियान्वयन रोडमैप भी जारी किया गया है।

हालांकि, इन नियमों के लागू होने के बाद से ही देशभर में विरोध प्रदर्शन और कानूनी चुनौतियां सामने आ रही हैं।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।