संविधान की प्रस्तावना में आपातकाल के दौरान किए गए संशोधन एक 'नासूर': उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

दिल्ली। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शनिवार को कहा कि किसी भी देश के संविधान की प्रस्तावना उसकी “आत्मा” होती है और उसे बदला नहीं जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के अलावा दुनिया के किसी अन्य देश में संविधान की प्रस्तावना..

संविधान की प्रस्तावना में आपातकाल के दौरान किए गए संशोधन एक 'नासूर': उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़
29-06-2025 - 10:24 AM

नयी दिल्ली। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शनिवार को कहा कि किसी भी देश के संविधान की प्रस्तावना उसकी आत्मा”  होती है और उसे बदला नहीं जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के अलावा दुनिया के किसी अन्य देश में संविधान की प्रस्तावना में कभी संशोधन नहीं हुआ।

वह यह बात ‘Ambedkar’s Messages’ नामक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में बोलते हुए कह रहे थे। धनखड़ ने 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम का ज़िक्र किया, जिसे 25 जून 1975 को घोषित आपातकाल के दौरान पारित किया गया था। इस संशोधन के ज़रिए प्रस्तावना में समाजवादी” (Socialist), “पंथनिरपेक्ष” (Secular), और “अखंडता” (Integrity) जैसे शब्द जोड़े गए थे।

धनखड़ ने इन संशोधनों की वैधता और समय को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह संशोधन उस दौर में हुआ जब देश में मौलिक अधिकार निलंबित थे और हजारों नागरिकों, जिनमें प्रमुख नेता भी शामिल थे, जेल में डाले गए थे।

उन्होंने कहा, जब 'हम भारत के लोग' दिल और आत्मा से लहूलुहान थे, तब वे अंधेरे में थे — और उस समय प्रस्तावना से छेड़छाड़ न्याय का मज़ाक थी।”

"न्यायपालिका की समझ को भी दी चुनौती"

उपराष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के 1973 के ऐतिहासिक फैसले केसवानंद भारती बनाम केरल राज्य का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि कैसे 13-न्यायाधीशों की पीठ ने प्रस्तावना को संविधान की व्याख्या का मार्गदर्शक माना था और न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने यह कहा था कि प्रस्तावना यह संकेत देती है कि संविधान की सत्ता "हम भारत के लोग" से आती है।

सनातन भावना और संविधान निर्माताओं के साथ विश्वासघात”

धनखड़ ने आगे कहा, ऐसे समय में संविधान की आत्मा को बदला गया जब जनता व्यावहारिक रूप से गुलामी जैसी स्थिति में थी — यह सनातन भावना के साथ पवित्रता का घोर अपमान है।”

उन्होंने कहा कि प्रस्तावना में जबरन जोड़े गए शब्द — "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष"एक नासूर” (festering wound) हैं, जो देश में भविष्य में अशांति” का कारण बन सकते हैं और यह संविधान निर्माताओं की सोच के साथ विश्वासघात है।

पृष्ठभूमि: RSS और BJP की मांग

धनखड़ की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब RSS और BJP के कुछ वर्ग प्रस्तावना से “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्दों को हटाने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि ये शब्द डॉ. भीमराव अंबेडकर के मूल मसौदे में नहीं थे और इन्हें जबरन जोड़ा गया था।

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