जीवन में आनन्द चाहते हैं तो राम रसायन अपने पास रखें..(4-अंतिम किश्त)
पिछले अंक में हमने बताया था..नील फियोर ने अपनी पुस्तक “द नाउ हैबिट: ए स्ट्रेटजिक प्रोग्राम फॉर ओवरकमिंग प्रोक्रस्टिनेशन एण्ड एन्जोयिंग गिल्ट फ्री प्ले” में कामचोरी और टालमटोल से होने वाले तनाव, चिंता और आत्मग्लानि से मुक्त आनन्दित जीवन के सूत्रों को बताया है
पिछले अंकों में हमने बताया था..
लेख-1 :- जब मन अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव करें और व्यक्ति भावविभोर हो जाए, उस मन:स्थिति को आनन्द कहते हैं I ऐसे मनोभाव हों तो व्यक्ति को न तो थकान का अनुभव होता है, न ही काम, पढ़ाई या दायित्व उसे बोझिल लगते हैं I ये सारी नकारात्मक अनुभूतियां आनन्द से स्वत: ही कोसों दूर भाग जाती हैं.. लेख-2 :- नाइट्रिक ऑक्साइड एक गैसीय न्यूरोट्रांसमीटर और संदेशवाहक अणु है, जो रक्त संचार, हृदय, मस्तिष्क, मांसपेशियों के संकुचन, तंत्रिका संचार और प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है I इसे ह्रदय के लिए जादुई अणु कहा जाता है। लेख -3 :- नील फियोर ने अपनी पुस्तक “द नाउ हैबिट: ए स्ट्रेटजिक प्रोग्राम फॉर ओवरकमिंग प्रोक्रस्टिनेशन एण्ड एन्जोयिंग गिल्ट फ्री प्ले” में कामचोरी और टालमटोल से होने वाले तनाव, चिंता और आत्मग्लानि से मुक्त आनन्दित जीवन के सूत्रों को बताया है I
अब अंतिम किश्त..
विद्यार्थियों को सामाजिकता का पाठ पढ़ाइये: डॉ. मैट्यू डी. लिबरमैन और डॉ. जॉन कैसिओप्पो के पृथक-पृथक शोधों के अनुसार शिक्षा में सामाजिकता को जोड़ने से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति, सीखने और समझने की क्षमता में वृद्धि होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं I साथ ही ऑक्सीटोसिन, डोपामिन, सिरोटोनिन जैसे रसायनों की बरसात होती है I
• विद्यार्थियों को अनाथाश्रम ले जाने से हुआ आनन्द और प्रेरणा का महाविस्फोट: यह 31.12.2016 की बात है, मैं अपने एम.बी.बी.एस. सेकण्ड इयर के छात्र-छात्राओं के साथ एक ऐसे अनाथालय में गया, जहां तीन वर्ष से 17 वर्ष तक के लगभग 70 अनाथ तथा निर्धन लड़के-लड़कियां निवास करते हुए अपनी पढ़ाई करते थे I चार-पांच घंटों में मेडिकल स्टूडेंट्स और वहां के बच्चों में स्नेह का ऐसा बंधन बना कि बिछड़ते समय दोनों पक्ष के छात्र-छात्राओं का परस्पर प्रेम आँखों में पानी बनकर बहने लगा I दोनों पक्षों में आनन्द स्पष्ट दिखाई दे रहा था I चिकित्सा विद्यार्थियों को जीवन में अभावों में भी प्रसन्नता से जीने की प्रेरणा मिली I उन्होंने अपने-अपने आनन्ददायी और प्रेरक अनुभवों को सोश्यल मीडिया पर कई दिनों तक डाला I इसके बाद यह क्रम तीन वर्षों तक हमारे कॉलेज की परम्परा बना रहा I
• विद्यालयों में इन आनन्ददायी गतिविधियों को संचालित किया जा सकता है: विद्यालयों में विद्यार्थियों में आनन्द को बढ़ावा देने के लिए इनमें से कुछ गतिविधियों को संचालित किया जाना चाहिए I तदर्थ स्विटजरलैंड की एक शिक्षण संस्था अपनी सभी स्तर की शिक्षण संस्थाओं में कई गतिविधियों को नियमित रूप से संचालित भी करती है I यथा, डायरी में उपकारियों के प्रति आभार लिखना I सकारात्मक लोगों के साथ रहना I मित्रता और सामाजिकता बढ़ाना I दान के लिए धन जुटाना और दयालुता के कार्य करना I व्यायाम, योग और ध्यान करना I पौष्टिक और संयमित आहार करना I मन की शक्ति को पहचानना, स्वयं पर और दूसरों पर विश्वास करना, अपने आसपास की दुनिया को खोजना I अपनी रुचि या जुनून के लिए समय निकालना I नई चीजें सीखना I कुछ घंटों के लिए मोबाइल-लैपटॉप आदि उपकरणों से मुक्त रहना I ठहाके लगाना या हंसना I पौधे लगाना और वृक्षों के सानिध्य में रहना या वन स्नान I धूप का सेवन I लक्ष्य प्राप्त करने पर उपलब्धि और संतोष की अनुभूति करना I
• करेंगे भला तो मिलेंगे आनन्द और नीरोगिता: प्रसिद्ध वैज्ञानिक, शोधकर्ता और ऊर्जा चिकित्सा के प्रचारक डॉ. गेटन शेवेलियर और अन्य वैज्ञानिकों के शोध अध्ययनों के अनुसार जब लोग दूसरों की सहायता करते हैं, तो उनके मस्तिष्क के उन-उन क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ जाती हैं, जो पुरस्कार [रिवार्ड], आनन्द, सहानुभूति और सामाजिक सम्बन्धों से जुड़े होते हैं I
पिछले अंकों के लेख यहां पढ़ें..
https://www.thenewsthikana.com/If-you-want-happiness-in-life-then-keep-Ram-Rasayan-with-you
https://www.thenewsthikana.com/If-you-want-happiness-in-life-then-keep-Ram-Rasayan-with-you..2
https://www.thenewsthikana.com/If-you-want-happiness-in-life-then-keep-Ram-Rasayan-with-you..3
• दीजिए दान, होगा कल्याण: दान करने से मस्तिष्क में डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन, सेरोटोनिन और एंडोर्फिन का स्तर बढ़ता है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ मिलता है I
• वर्ष में एक दो बार तीर्थयात्रा करें:जब हम सांस लेते हैं तो कुछ ऋणात्मक आयन हमारे भीतर प्रवेश करते हैं I फ्रेड सोयका और एलन एडमंड्स ने अपनी पुस्तक “द आयन इफेक्ट” में बताया है कि ये आयन श्वास की वायु की गुणवत्ता में सुधार करते हैं, श्वसन तंत्र और रक्त संचार तंत्र को बेहतर बनाते हैं I इनका उच्च स्तर मस्तिष्क में सिरोटोनिन के स्तर को संतुलित करता है तथा तनाव और अवसाद के लक्षणों में कमी लाता है I इन आयनों की मात्रा पहाड़ों, नदी और समुद्र तटों और वर्षावनों में अधिक होती है I और हमारे अधिकांश तीर्थस्थान भी ऐसे ही स्थलों के निकट हैं I
• अपने बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी के सानिध्य में रखें: दादा-दादी या नाना-नानी के साथ रहने वाले बच्चों के मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन, सेरोटोनिन, डोपामिन और एंडोर्फिन का स्तर अधिक रहता है I ऐसे बच्चे मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ, मजबूत, करुणाशील तथा आत्मनिर्भर होते हैं I
• वन अवश्य जाएं: साल में एक दो बार घने जंगल में घूमने से एंडोर्फिन, सेरोटोनिन, डोपामिन, ऑक्सीटोसिन, मेलाटोनिन और फाइटोनसाइड्स का स्तर बढ़ता है I
• घर में कम से कम वस्तुओं के साथ जियें: जैन दर्शन और जापान के न्यूनतावाद के अनुसार कम और आवश्यक सामान रखने से स्वयं और परिवार के लिए अधिक समय मिलता है और तनाव कम रहता है I ऐसा करने से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आनन्द प्राप्त होता है I
• भावनात्मक शुद्धिकरण या कैथार्सिस: आपाधापी, भागमभाग और गलाकाट प्रतिस्पर्धा भरे जीवन में तनाव तथा नकारात्मक मनोभाव अभिन्न अंग बन चुके हैं I जैसे हम घर की गंदगी प्रतिदिन घर से बाहर निकालते हैं वैसे ही नकारात्मक मनोभावों को बाहर निकालना अनिवार्यता है अन्यथा मनोशारीरिक रोग हो जाते हैं I भावनात्मक शुद्धिकरण प्रक्रिया के तहत अपने तनावों और जिन लोगों या स्थितियों के कारण तनाव या क्रोध या विकलता या दुःख को उनके प्रति अपना क्रोध डायरी में लिखें, अपने मित्रों को खुलकर बताएं, बिंदास होकर कहीं अकेले में जाकर चिल्लाएं, तकिये पर लाठियां बरसाएं कहते का तात्पर्य है कि अपने भीतर से नकारात्मक भावों को बाहर निकालना है I इसके अतिरिक्त अपने सोचने और किसी समस्या, व्यक्ति आदि को देखने का दृष्टिकोण बदलें I समस्या का कारण खोजें, फिर उसका समाधान खोजें I स्वयं से सकारात्मक बातें करें I अपनी रुचि के काम करें, चित्रकारी करें, शास्त्रीय संगीत अथवा भजन सुनें I ध्यान करें, सकारात्मक सोचें, ॐकार का सस्वर उच्चारण करें I कृत्रिम ही सही परन्तु ठहाके लगाएं I
अन्त में, ऐसा नहीं है कि उपरोक्त सकारात्मक गतिवधियों से ही आनन्ददायक रसायनों का स्तर बढ़ता है, सच तो यह भी है कि ईर्ष्या, बुराई, चाटुकारिता, टालमटोल, कामचोरी, किसी को अकारण परेशान करने, रिश्वत लेने, नशा करने, बलात्कार करने, फास्टफूड या जंकफूड या कोल्डड्रिंक का सेवन करने आदि से भी आनन्दकारी रसायन निकलते हैं परन्तु साथ ही साथ रोगकारी, चिंता, तनाव आदि को जन्म देने वाले तथा रोग प्रतिरोधी शक्ति को कमजोर करने वाले रसायन भी प्रचुर मात्रा में निकलते हैं I ऐसे जितने भी कृत्य है जिनसे किसी व्यक्ति का अहित होता हो या स्वयं के दायित्वों से पलायन होता हो या स्वयं की योग्यता के विपरीत लाभ होता हो तो ये कृत्य व्यक्ति की कथित प्रसन्नता पर बहुत भारी पड़ते हैं I यह वैज्ञानिक तथ्य तो है ही साथ ही सभी धर्मग्रंथों में भी इस विषय में विस्तार से लिखा गया है I परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सैम नहीं अधमाई I
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् I
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