अजमेर शरीफ दरगाह में पीएम मोदी की ओर से चादर चढ़ाने के खिलाफ याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट बोला—‘न्यायिक जांच के दायरे में नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के 814वें वार्षिक उर्स के दौरान अजमेर शरीफ दरगाह में औपचारिक चादर चढ़ाने से रोकने की मांग की गई..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के 814वें वार्षिक उर्स के दौरान अजमेर शरीफ दरगाह में औपचारिक चादर चढ़ाने से रोकने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे न्यायिक जांच के दायरे में नहीं आते।
बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले का अदालत द्वारा निपटारा नहीं किया जा सकता। संक्षिप्त सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की, “हमारी राय में, इस याचिका में उठाए गए मुद्दे न्यायिक रूप से विचारणीय नहीं हैं। इसलिए याचिका खारिज की जाती है।”
अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि चादर पहले ही चढ़ाई जा चुकी है, इसलिए यह मामला अब निरर्थक हो गया है। आदेश में कहा गया,
“अब यह मामला निष्प्रभावी हो चुका है। यह कोई न्यायिक रूप से विचारणीय मुद्दा नहीं है। उठाए गए किसी भी प्रश्न पर न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। रिट याचिका खारिज की जाती है।”
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका यह आदेश अजमेर की एक ट्रायल कोर्ट में लंबित सिविल मुकदमे को प्रभावित नहीं करेगा। पीठ ने कहा,
“सिविल वाद लंबित है, उसे आगे बढ़ाइए। यह आदेश लंबित सिविल मुकदमे पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डालेगा।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि रिट याचिका खारिज होने से चल रही कार्यवाही के परिणाम पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।
यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह द्वारा अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से जनहित याचिका के रूप में दायर की गई थी। याचिका में प्रधानमंत्री और अन्य सरकारी प्राधिकरणों को अजमेर शरीफ दरगाह में चादर चढ़ाने के माध्यम से ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जाने वाले कथित “राज्य-प्रायोजित औपचारिक सम्मान, आधिकारिक संरक्षण और प्रतीकात्मक मान्यता” से रोकने के निर्देश मांगे गए थे।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिन्हा ने दलील दी कि इस तरह के आधिकारिक कृत्य संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हैं और इनके लिए कोई कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने 1961 के संविधान पीठ के फैसले दरगाह कमेटी, अजमेर एवं अन्य बनाम सैयद हुसैन अली एवं अन्य का हवाला देते हुए कहा कि अजमेर दरगाह संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षित धार्मिक संप्रदाय नहीं है।
उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि वर्ष 2024 में अजमेर में एक सिविल वाद दायर किया गया है, जिसमें दरगाह पर एक हिंदू मंदिर के अनधिकृत कब्जे का आरोप लगाया गया है और यह मामला फिलहाल विचाराधीन (सब-जुडिस) है।
हालांकि, पीठ इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई और उसने रिट अधिकार क्षेत्र के प्रयोग से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उठाया गया विवाद संवैधानिक न्यायिक निर्णय की मांग नहीं करता।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे कुछ सप्ताह पहले 22 दिसंबर को उर्स से पहले इस याचिका की तत्काल सुनवाई करने से भी इनकार कर दिया था। उसी दिन केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से अजमेर शरीफ दरगाह में औपचारिक चादर चढ़ाई थी, जो स्वतंत्रता के बाद से लगातार विभिन्न प्रधानमंत्रियों द्वारा निभाई जाती रही परंपरा है।
इससे पहले, हिंदू सेना के तत्कालीन अध्यक्ष विष्णु गुप्ता द्वारा भी अजमेर की एक अदालत में इसी तरह की अर्जी दायर की गई थी, जो उस सिविल मुकदमे का हिस्सा है जिसमें दावा किया गया है कि अजमेर शरीफ दरगाह एक ध्वस्त शिव मंदिर के स्थल पर बनाई गई है।
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