"तालिबान ने जारी किया 'ग्रेटर अफगानिस्तान' का नक्शा.. डुरंड रेखा गायब, कश्मीर का हिस्सा भी जोड़ा गया; भारत की प्रतिक्रिया क्या होगी?"
पिछले महीने पाकिस्तान के साथ झड़पों के बाद अब तालिबान और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक नया दौर शुरू हो गया है। अफगानिस्तान के ‘अल-मद्रसा अल-असरिया’ के छात्रों ने हाल ही में तालिबान के उपमंत्री मोहम्मद नबी उमरी को ‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ का नक्शा भेंट किया है। इस नक्शे ने पूरे दक्षिण एशिया में हलचल मचा दी है। अगर यह ‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ वाला नक्शा हकीकत बनता है, तो पाकिस्तान का लगभग आधा हिस्सा मानचित्र से गायब हो ..
नयी दिल्ली। पिछले महीने पाकिस्तान के साथ झड़पों के बाद अब तालिबान और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक नया दौर शुरू हो गया है। अफगानिस्तान के ‘अल-मद्रसा अल-असरिया’ के छात्रों ने हाल ही में तालिबान के उपमंत्री मोहम्मद नबी उमरी को ‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ का नक्शा भेंट किया है। इस नक्शे ने पूरे दक्षिण एशिया में हलचल मचा दी है। अगर यह ‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ वाला नक्शा हकीकत बनता है, तो पाकिस्तान का लगभग आधा हिस्सा मानचित्र से गायब हो जाएगा।
इस नक्शे में पाकिस्तान के कई प्रांत खैबर पख्तूनख्वा (KPK), गिलगित-बाल्टिस्तान (GB) और बलूचिस्तान को अफगानिस्तान के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। ध्यान देने योग्य है कि गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) का हिस्सा है, जिस पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है। इस नक्शे के उभरने से दोनों देशों के बीच एक नई तरह के युद्ध की शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं।
क्यों ‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ का सपना बढ़ा रहा है टकराव?
‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ या ‘पश्तूनिस्तान’ का विचार अफगानों के मन में कई वर्षों से जड़ें जमाए हुए है। दरअसल, अफगानिस्तान कभी भी पाकिस्तान के साथ अपनी सीमा को तय करने वाली डुरंड रेखा (Durand Line) को मान्यता नहीं देता।
यह रेखा 1893 में ब्रिटिश सरकार ने अफगानिस्तान और तत्कालीन भारत के बीच खींची थी। लेकिन अफगान हमेशा से इसका विरोध करते आए हैं।
अफगान राष्ट्रवादी दावा करते हैं कि पाकिस्तान के भीतर के पश्तून बहुल क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अफगानिस्तान का हिस्सा रहे हैं। यही मुद्दा बार-बार पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संघर्ष का कारण बनता रहा है।
6 नवंबर को इस्तांबुल में फिर आमने-सामने होंगे दोनों पक्ष
पिछले महीने पाकिस्तान और तालिबान के बीच जो संघर्ष हुआ था, उसकी जड़ भी यही डुरंड रेखा विवाद था। इस संघर्ष के बाद कतर और तुर्की की मध्यस्थता में अस्थायी युद्धविराम कराया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह किसी भी वक्त टूट सकता है।
पाकिस्तान ने कहा है कि सीमा पर युद्धविराम तब तक लागू रहेगा जब तक तालिबान सरकार कुछ “विशेष आश्वासन” देती है। वहीं तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि “सभी पक्षों ने एक निगरानी और सत्यापन तंत्र (monitoring and verification mechanism) स्थापित करने पर सहमति जताई है, जिससे शांति बनी रहे और उल्लंघन करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई हो।”
मंत्रालय ने आगे बताया कि दोनों पक्ष 6 नवंबर को इस्तांबुल में एक उच्च-स्तरीय बैठक करेंगे, जिसमें युद्धविराम को लागू करने के तरीकों को अंतिम रूप दिया जाएगा।
तालिबान अब भी नहीं मानता डुरंड रेखा
न्यूज़18 की एक रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष खुफिया सूत्रों और तालिबान से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि तालिबान, अफगानिस्तान की पूर्ववर्ती सरकारों की तरह, दुरंड रेखा को एक काल्पनिक रेखा मानता है, वास्तविक नहीं।
तालिबान का कहना है कि पाकिस्तान को इस रेखा के पूर्व के क्षेत्रों पर कोई वैध दावा नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, “तालिबान का मानना है कि पाकिस्तान ने अमेरिकी युद्ध के दौरान रणनीतिक लाभ पाने के लिए अफगान भूमि, संसाधनों और लड़ाकों का इस्तेमाल किया।”
‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ का नक्शा पेश करके तालिबान न केवल राष्ट्रीय गौरव को स्थापित करना चाहता है, बल्कि पाकिस्तान द्वारा काबुल की नीतियों को प्रभावित करने के किसी भी प्रयास को निष्फल करने का संकेत भी दे रहा है।
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