लाल सागर में अकेला पड़ा अमेरिका? हूतियों के खिलाफ क्यों नहीं साथ दे रहे सहयोगी देश
<p>यमन के हूती विद्रोही लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों को निशाना बना रहे हैं। गाजा पट्टी में युद्ध के बाद फिलिस्तीनी लोगों से अपना समर्थन जताने और हमास को मदद करने के लिए हूतियों ने अपने हमले शुरू किए हैं। हूतियों ने इजरायल से जुड़े जहाजों के खिलाफ मिसाइल हमले किए हैं और उनको अगवा भी किया है। इन हमलों ने कई कंपनियों को माल की आवाजाही रोकने पर भी मजबूर किया है।</p>
गाजा पट्टी में जंग शुरू होने के बाद लाल सागर में यमन के हूती विद्रोहियों ने इजरायल के जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों पर हमले हुए तो अमेरिका ने इस मुद्दे पर दुनिया के बड़े देशों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। अमेरिका की ओर से लाल सागर में जहाजों को सुरक्षा देने के लिए एक मल्टीनेशनल टास्क फोर्स बनाने का ऐलान कर दिया गया। इसे ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन नाम दिया गया है।
अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने लाल सागर में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही में सहायता के लिए 19 दिसंबर को ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन की घोषणा की थी। इस घोषणा के करीब 15 दिन बाद भी अमेरिका के कई अहम सहयोगियों ने इसमें शामिल होने से कन्नी काट रखी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अमेरिका की नाराजगी लेकर भी क्यों उसके कई खास सहयोगी इस ऑपरेशन का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं।
अमेरिकी के साझीदार इस अहम ऑपरेशन से हुए गायब
अमेरिका ने लाल सागर में ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन का ऐलान करने के बाद बताया गया कि 9 देश इस ऑपरेशन में शामिल हो रहे हैं। इनमें अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, बहरीन, कनाडा, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे, सेशेल्स और स्पेन शामिल हैं। खास बात ये है कि इस सूची से अमेरिकी के अहम साझेदार जैसे ऑस्ट्रेलिया, जापान और सऊदी अरब गायब हैं। पश्चिम एशिया से बहरीन एकमात्र देश है जो इस ऑपरेशन में शामिल हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों ने ये भी कहा है कि 20 से अधिक देश इस ऑपरेशन में शामिल हो चुके हैं, लेकिन वे सार्वजनिक रूप से खुद को भागीदार घोषित करने के इच्छुक नहीं हैं।
फिलीस्तीन में चल रही लड़ाई अहम वजह
अमेरिका के अरब साझीदारों के इस ऑपरेशन से कन्नी काटने की एक अहम वजह फिलीस्तीन में चल रही लड़ाई भी है। 1948 में इजरायल के निर्माण के बाद से अरब देशों ने इसके सैद्धांतिक विरोध का दावा किया है और फिलिस्तीन के मुद्दे का समर्थन किया है। भले ही कई अरब देशों के इजरायल के साथ संबंध हैं लेकिन गाजा में जिस तरह से इजरायल की कार्रवाई की मानवाधिकार के नजरिए से विश्व स्तर पर निंदा हो रही है। उसे देखते हुए वह इजरायल के पक्ष में नहीं दिख सकते हैं।
अरब देश ने बनाई इस ऑपरेशन से दूरी
संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, ओमान, कतर, कुवैत, मिस्र और मोरक्को ने इजरायल के हमलों की खुलकर निंदा की है। हूतियों के खिलाफ बन रहे इस ग्रुप में शामिल होने पर निश्चित रूप से इन देशों को उनके पूर्व रुख पर आलोचना का सामना करना पड़ेगा। इन सरकारों को आम लोगों के गुस्से का भी सामना करना पड़ सकता है।
सऊदी अरब नहीं उलझने के मूड में
अमेरिका के खास सहयोगी सऊदी अरब की बात की जाए तो सऊदी ने लंबे समय तक यमन में हूती विरोधी ताकतों का समर्थन किया है और लंबी लड़ाई लड़ी है। अब जबकि हूतियों ने यमन के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा कर लिया है तो सऊदी अरब फिर से उनसे उलझने को तैयार नहीं है, वह अब बातचीत से मामला का हल चाहता है और शांति वार्ता में भाग ले रहा है।
औपचारिकता के तौर पर कुछ सैनिक भेज रहे कई देश
अरब देशों के अलावा दूसरे देशों में भी इस मिशन में पूरी तरह से शामिल होने को लेकर अनिच्छा है। स्पेन के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि हम लाल सागर ऑपरेशन में एकतरफा भाग नहीं लेंगे। इटली इतालवी जहाज मालिकों के विशिष्ट अनुरोध पर नौसेना फ्रिगेट वर्जिनियो फासन को लाल सागर में भेज रहा है लेकिन यह ऑपरेशन के तहत नहीं किया जा रहा है। नीदरलैंड ने कहा कि वह दो स्टाफ अधिकारी भेजेगा और नॉर्वे वह 10 नौसेना अधिकारी बहरीन भेजेगा। डेनमार्क ने कहा कि उसकी भागीदारी एक अधिकारी को भेजने के रूप में होगी।
बहु-नौसेना कार्यबल में 39 सदस्य
ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि वह कोई जहाज या विमान नहीं भेजेगा, बल्कि संयुक्त समुद्री बलों (सीएमएफ) में अपना योगदान तीन गुना कर देगा। यह एक बहु-नौसेना कार्यबल है जिसमें 39 सदस्य हैं-जिनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, ब्राजील, कनाडा, मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, पाकिस्तान, फिलीपींस, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और यमन शामिल हैं। यानी अरब देशों के अलावा जिन देशों ने इसमें शामिल होने की हामी भरी है, वो सिर्फ औपचारिकता भर की है।
हूती पहुंचा रहे इजरायल को नुकसान
इसकी एक वजह ये है कि हूतियों ने इजरायल के अलावा दूसरे देशों के जहाजों को नुकसान नहीं पहुंचाने की बात कही है। ऐसे में हूतियों के खिलाफ संघर्ष में शामिल होकर ये देश अपने लिए लाल सागर के रास्ते को बंद करने का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं।
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