पीएम मोदी और गुजरात दंगों पर केंद्रित बीबीसी की डॉक्यूरमेंट्री पर रोक, जेएनयू में बवाल.. इंदिरा गांधी, मनमोहन सिंह, राजीव सरकार में कई फिल्मों को किया गया था बैन..!
<p><em>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गोधरा दंगों को केंद्र रखकर बीबीसी द्वारा बनायी गयी डॉक्‍युमेंट्री पर विवाद इतना बढ़ गया है कि सरकार ने इस पर रोक लगाने का फैसला किया है। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में इसे सार्वजनिक रूप से दिखाने को लेकर कल रात हंगामा हुआ। वहां पब्लिक स्क्रीनिंग की आशंका को देखते हुए बिजली काट दी गयी। अंधेरा होने पर वहां पत्थरबाजी की घटना भी सामने आई और छात्र नेताओं के इस मामले पर एक-दूसरे संगठनों पर आरोप लगाये हैं। हालांकि इस मामले मे अभी तक कोई एफआईआर की जानकारी नहीं आई।</em></p>
उधर, डॉक्युमेंट्री पर रोक के बाद से विपक्षी दल के नेता पीएम मोदी को लेकर हमलावर हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि क्या पीएम महात्मा गांधी की हत्या करने वाले गोडसे पर रिलीज होने वाली फिल्म को भी बैन करेंगे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी बोले हैं कि किसी तरह की पाबंदी, दमन या लोगों को डराने से सच सामने आने से रुकने वाला नहीं है।
बता दें कि बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री का नाम 'इंडिया: द मोदी क्वेश्चन' है। यह 2002 के गुजरात दंगों पर आधारित है। इस डॉक्यूमेंट्री के ट्वीट और वीडियो को यू-ट्यूब से हटा दिया गया है। इससे जुड़े 50 लिंक भी ब्लॉक कर दिए गए हैं। सरकार ने इसे दुष्प्रचार की कोशिश बताया है। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब किसी सरकार ने इस तरह का ऐक्शन लिया हो। इसके पहले इंदिरा गांधी, मनमोहन सिंह और राजीव गांधी समेत कई सरकारों में विवादित फिल्मों और डॉक्युमेंट्री पर कार्रवाई हो चुकी है।
उल्लेखनीय है कि जिन फिल्मों पर पाबंदी लगाई गयी, उनमें 1975 में आई फिल्म 'आंधी' को सभी याद करते हैं। यह वही साल था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई थी। उनके इस कदम की खूब आलोचना के साथ विरोध प्रदर्शन भी हुए थे। फिल्म में सुचित्रा सेन मुख्य किरदार में थीं। नायिका की बहुत सी बातें इंदिरा से मिलती थीं। उनकी साड़ी, हेयरस्टाइल, चलने-फिरने का तरीका, बोलने का ढंग इनमें शामिल थे। फिल्म में हीरोइन के स्मोकिंग और ड्रिंकिंग करने ने आग में घी डालने का काम किया था। इसके बाद इंदिरा सरकार ने फिल्म पर रोक लगा दी थी। जब 1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हारीं तो सत्तारूढ़ जनता पार्टी ने बैन को हटा लिया था। यहां तक इसे दूरदर्शन पर भी दिखाया गया था।
इसी तरह अमृत नाहटा की फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' भी बहुत ही चर्चित हुई थी। वर्ष 1977 में रिलीज यह फिल्म इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय पर व्यंग्य करती थी। शबाना आजमी और राज बब्बर जैसी स्टार कास्ट वाली इस फिल्म को तब इंदिरा सरकार ने बैन कर दिया था। फिल्म के सभी प्रिंट भी जब्त कर लिये गये थे। हिंदी की नहीं तमिल फिल्म कुत्रापथिरिकई जिसका निर्देशन आरके सेल्वामणी ने किया था, को भी रोक दिया गया था। यह फिल्म राजीव गांधी और श्रीलंका सिविल वार की पृष्ठभूमि पर बनी थी। यह फिल्म 1993 में ही पूरी हो गई थी लेकिन वर्ष 2007 तक इसे रिलीज नहीं किया गया।
वर्ष 1984 में हुए सिख दंगों पर बनी फिल्म 'हवाएं' को दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और पंजाब में बैन कर दिया गया था। इसी तरह पंजाबी फिल्म 'कौम दे हीरे' पर पंजाब में तत्कलीन अमरिंदर सिंह सरकार ने रोक लगाई थी। यह फिल्म सतवंत सिंह, बेअंत सिंह और केहर सिंह की जिंदगी पर आधारित थी। इन तीनों ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी। इसी क्रम में 2004 में रिलीज फिल्म 'ब्लैक फ्राइडे' को भी बैन का सामना करना पड़ा। यह फिल्म 1993 के मुंबई ब्लास्ट पर बनी थी। अदालती दखल के बाद यह फिल्म बाद में रिलीज हो सकी थी। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में डॉक्युमेंट्री 'इंशाअल्लाह कश्मीर' पर भी बैन लगा था। यह डॉक्युमेंट्री कश्मीर संकट पर बनी थी। इसके निर्देशक अश्विन कुमार थे। वर्ष 2004 में रिलीज हो रही फिल्म 'हवा आने दो' उन दो भाइयों की कहानी थी जो कश्मीर में लड़ रहे थे। सेंसर बोर्ड ने इसमें कई कट लगाने का सुझाव दिया लेकिन इससे फिल्म की लंबाई घटकर करीब 20 मिनट ही रह जाती। डायरेक्टर पार्थो सेन गुप्ता ने ऐसा करने से मना कर दिया। इसके चलते यह फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाई।
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