कांग्रेस के ‘कमल’! बीजेपी क्यों लाना चाहती है कमलनाथ को साथ
<p>सियासी गलियारों में चर्चा चल रही है कि कमलनाथ कांग्रेस से दशकों पुराना नाता तोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले हैं। अगर यह सुगबुगागट हकीकत में तब्दील होती है तो मध्य प्रदेश की सियासत में कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका होगा। आखिर मध्य प्रदेश की सियासत में कमलनाथ का क्या महत्व है।</p>
‘कांग्रेस में मैं एकमात्र कमल हूं’ एक बार कमलनाथ ने अपने नाम का जिक्र करते हुए मजाकिया लहजे में यह बात कही थी, जो प्रतिद्वंद्वि बीजेपी का चुनाव चिह्न है। हालांकि अब सियासी गलियारों में चर्चा चल रही है कि कमलनाथ कांग्रेस से दशकों पुराना नाता तोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले हैं। अगर यह सुगबुगाहट हकीकत में तब्दील होती है तो मध्य प्रदेश की सियासत में कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका होगा।
1980 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए कमलनाथ को इंदिरा गांधी से लेकर संजय, राजीव, सोनिया गांधी और अब उनके बच्चों राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तक, गांधी परिवार की हर तस्वीर में उनके साथ नजर आने का गौरव प्राप्त है। कमलनाथ दरअसल अंबिका सोनी के साथ संजय गांधी के सबसे करीबी नेताओं में से एक थे, जिसे ‘युवा तुर्क’ क्लब के रूप में जाना जाता था।
कांग्रेस के लिए कितने खास रहे कमलनाथ
वर्ष 2004 में, जब सोनिया गांधी ने बीजेपी से मुकाबला करने के लिए गठबंधन बनाने की कोशिशें शुरू कीं, तब कमलनाथ ने उसमें खासी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ही द्रमुक तक कांग्रेस की बात पहुंचाई और उन्हीं की बदौलत गोविंदा जैसे फिल्मी सितारे कांग्रेस में शामिल हुए। कई राजनीतिक दलों के अलावा कॉरपोरेट्स के साथ उनके अच्छे समीकरणों ने उन्हें संसदीय कार्यमंत्री बनने के लिए स्वाभाविक पसंद बना दिया, जिनकी प्राथमिक भूमिका सदन में फ्लोर की रणनीति तैयार करना होता है। कमलनाथ को वाणिज्य मंत्री की भी जिम्मेदारी दी गई थी। वह कांग्रेस के लिए फंड जुटाने में भी अहम भूमिका निभाते थे।
भगवा रंग से अछूता रहा था छिंदवाड़ा
मध्य प्रदेश का छिंदवाड़ा क्षेत्र कमलनाथ का गढ़ कहा जाता है, जहां वह नौ बार निर्वाचित हुए और अब उनके बेटे नकुल नाथ संसद में इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दर्शाता है कि कांग्रेस की राज्य इकाई के लिए कमलनाथ का साथ कितना अहम हो जाता है। छिंदवाड़ा में कमलनाथ का विशाल सफेद बंगला एक द्वीप की तरह खड़ा दिखता है। बाहर हमेशा भारी भीड़ जमा रहती है। उनके नेतृत्व में इलाके का काफी विकास भी हुआ है। कमलनाथ की पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगता है कि मध्य प्रदेश का बाकी हिस्सा भले ही भगवा हो गया हो, लेकिन उनका गढ़ छिंदवाड़ा इससे अछूता ही रहा।
मध्य प्रदेश पर लगा दिया अपना पूरा जोर
यह महसूस करते हुए कि कांग्रेस केंद्र में जल्द वापस नहीं आने वाली, कमलनाथ ने खुद को राज्य की राजनीति में झोंक दिया। केंद्र में कमान संभालने और बीजेपी से मुकाबले के लिए सोनिया गांधी के समझाने के बावजूद, कांग्रेस के दिग्गज नेता ने इनकार कर दिया। वह 2018 में राज्य के 18वें मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल पाई।
कांग्रेस से रिश्तों में क्यों आई खटास
कमलनाथ की कांग्रेस के साथ रिश्तों में आई खटास की कई वजहें बताई जाती हैं। माना जाता है कि कमलनाथ राज्यसभा सीट चाहते थे, लेकिन यह सीट पार्टी प्रतिद्वंद्वी दिग्विजय सिंह के करीबी अशोक सिंह को दे दी गई। वहीं, खराब स्वास्थ्य से जूझ रहे कमलनाथ यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका बेटा नकुलनाथ का सियासी भविष्य मजबूत रहे। सूत्रों का कहना है कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि नकुल कांग्रेस के टिकट पर जीत पाएंगे या नहीं। आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर भी उनके मन में संदेह बताया जाता है।
गांधी परिवार के लिए होगा बड़ा झटका
अब यह स्पष्ट है कि कमलनाथ राहुल गांधी के साथ उस समीकरण को साझा नहीं करते हैं जो उन्होंने उनके माता-पिता राजीव और सोनिया के साथ साझा किया था। बीजेपी के लिए इस ‘कमल’ का साथ आना, गांधी परिवार के लिए बड़ा झटका होगा। वहीं, कमलनाथ के लिए, पाला बदलने का मतलब होगा कि इस ‘कमल’ के पास अब एक नया ‘नाथ’ होगा।
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