बिहार विधानसभा चुनाव: जातीय जनगणना के बाद बदलते समीकरणों के बीच ओबीसी और सवर्णों को मिला बड़ा हिस्सा..!

बिहार की जातीय जनगणना के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच, आगामी विधानसभा चुनावों में एनडीए और महागठबंधन दोनों ने अपने उम्मीदवार चयन की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। भाजपा, जद(यू), लोजपा, हम और आरएलएम से मिलकर बने एनडीए और राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने इस बार ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और सवर्ण (उच्च जाति) समुदायों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया

बिहार विधानसभा चुनाव: जातीय जनगणना के बाद बदलते समीकरणों के बीच ओबीसी और सवर्णों को मिला बड़ा हिस्सा..!
23-10-2025 - 10:34 AM

पटना। बिहार की जातीय जनगणना के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच, आगामी विधानसभा चुनावों में एनडीए और महागठबंधन—दोनों ने अपने उम्मीदवार चयन की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। भाजपा, जद(यू), लोजपा, हम और आरएलएम से मिलकर बने एनडीए और राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने इस बार ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और सवर्ण (उच्च जाति) समुदायों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है साथ ही मुसलमानों और अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) को भी प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है।

इस चुनाव में दोनों पक्ष खुद को ओबीसी हितों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ सवर्ण वर्ग की चिंताओं को भी संबोधित करने की राजनीति कर रहे हैं। यह रुझान पिछले चुनावों की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
राजद, जो पहले तक खुद को गैर-सवर्ण समुदायों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, ने इस बार बड़ी संख्या में सवर्ण उम्मीदवारों विशेष रूप से भूमिहार समुदाय से, को टिकट दिया है।

सवर्ण उम्मीदवारों का प्रतिनिधित्व कुछ बढ़ा है—राजद ने 15 सवर्ण प्रत्याशी उतारे हैं, जिनमें तीन ब्राह्मण, छह भूमिहार और छह राजपूत शामिल हैं।

राजद ने इस बार खुद को “सभी समुदायों की पार्टी” के रूप में दिखाने के प्रयास में 77 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया है। इनमें से 53 यादव हैं, जो पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक को दर्शाता है। राजद ने मुसलमानों को भी सबसे अधिक—18 टिकट दिए हैं, जबकि जद(यू) ने 5 और लोजपा ने 1 टिकट दिया है। इसके अलावा अनुसूचित जातियों (SC) को 20, अतिपिछड़ों (EBC) को 12 और अनुसूचित जनजातियों (ST) को 1 टिकट दिया गया है। कोइरी समुदाय (जो ओबीसी वर्ग में आता है) से 14 उम्मीदवार मैदान में हैं। साल 2020 के चुनाव में राजद ने 58 यादव और 13 सवर्ण प्रत्याशी उतारे थे।

एनडीए की ओर से भाजपा ने सवर्ण समुदाय पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित किया है—उसने राजपूत और भूमिहार वर्ग से 49 उम्मीदवारों को टिकट दिया है। वहीं जद(यू) ने अधिक संतुलित रुख अपनाया है—उसने 22 सीटें सवर्णों को और 37 सीटें ओबीसी उम्मीदवारों को दी हैं, जो भाजपा के 30 ओबीसी उम्मीदवारों से सात अधिक हैं।

इस रणनीति के पीछे के तर्क पर जद(यू) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, बिहार की राजनीति में ओबीसी को दूसरे पायदान पर नहीं रखा जा सकता। उनकी चुनावी ताकत राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती है।”

तीनों प्रमुख दल—भाजपा, जद(यू) और राजद—ने ओबीसी और सवर्ण वर्गों को प्राथमिकता देते हुए अपनी उम्मीदवार सूची तैयार की है। यह सामाजिक समीकरणों में एक नए संतुलन की ओर इशारा करता है।
राजद ने जहाँ 2020 की तुलना में यादव उम्मीदवारों की संख्या 58 से घटाकर 53 कर दी है, वहीं उसने अनुसूचित जातियों को तीसरी प्राथमिकता दी है और ईबीसी, मुसलमान तथा सवर्ण समुदायों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है।

महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भी इस बार उल्लेखनीय बदलाव देखा गया है। राजद ने 24 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जो सभी दलों में सबसे अधिक है। भाजपा-जद(यू) गठबंधन ने कुल 13 महिला उम्मीदवारों को उतारा है, जबकि लोजपा ने 5, जिससे एनडीए में कुल महिला उम्मीदवारों की संख्या 18 हो गई है।

कुल मिलाकर, यह चुनाव बिहार की जातीय राजनीति में एक स्पष्ट बदलाव का संकेत देता है। सभी प्रमुख दल अब ओबीसी और सवर्णों के हितों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही अन्य समुदायों को भी प्रतिनिधित्व दे रहे हैं। दोनों गठबंधनों की उम्मीदवार सूची इस बात का प्रमाण है कि बिहार की राजनीति में आज भी जातीय समीकरण चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बने हुए हैं।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।