राज्य चुनावों से पहले कांग्रेस में उथल-पुथल, संगठन और नेतृत्व को लेकर गहराता असमंजस
चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी गंभीर अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। पार्टी द्वारा प्रस्तावित ‘सेव मनरेगा’ आंदोलन, जिसे पहले 4 जनवरी से शुरू किया जाना था, राहुल गांधी के विदेश दौरे के कारण टालकर 10 जनवरी कर दिया गया। इस समय राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी दोनों विदेश में..
नयी दिल्ली। चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी गंभीर अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। पार्टी द्वारा प्रस्तावित ‘सेव मनरेगा’ आंदोलन, जिसे पहले 4 जनवरी से शुरू किया जाना था, राहुल गांधी के विदेश दौरे के कारण टालकर 10 जनवरी कर दिया गया। इस समय राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी दोनों विदेश में हैं, जबकि उनकी मां सोनिया गांधी की तबीयत खराब बताई जा रही है। इस बीच सोशल मीडिया पर संगठनात्मक बदलावों को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है, जिससे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल को बदले जाने की चर्चाएं तेज हैं। संभावित विकल्पों के रूप में अजय माकन और सचिन पायलट के नाम सामने आ रहे हैं। कुछ हलकों में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सचिन पायलट को लेकर एक नई नेतृत्व त्रयी की भी चर्चा है, जिसमें कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम भी जोड़े जा रहे हैं।
आंतरिक सत्ता संघर्ष इस अनिश्चितता को और बढ़ा रहा है। कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच खींचतान की खबरें हैं। वहीं, के.सी. वेणुगोपाल को केरल में जिम्मेदारी सौंपे जाने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं, खासकर ऐसे समय में जब वहां कांग्रेस की स्थिति में सुधार देखा जा रहा है। इसके अलावा राहुल और प्रियंका गांधी के बीच मतभेद की खबरों ने भी पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं। इसका एक उदाहरण तब सामने आया, जब प्रियंका गांधी को असम की स्क्रीनिंग कमेटी में नियुक्त किए जाने पर भाजपा ने आलोचना और तंज कसे।
देशव्यापी मनरेगा अभियान की घोषणा के बावजूद कांग्रेस इसे ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में नाकाम रही है। इसकी एक वजह केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना मानी जा रही है, वहीं विपक्षी दलों के साथ समन्वय की कमी भी अभियान की गति को प्रभावित कर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की कथित उदासीनता ने कार्यकर्ताओं का मनोबल और गिरा दिया है।
जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और केरल में चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, कांग्रेस संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व को लेकर असमंजस और उभरते आंतरिक गुटों से जूझती दिख रही है। इसके उलट, प्रतिद्वंद्वी दल चुनावी तैयारियों में सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं, जिससे कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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