30 साल पुराने 20 रुपये की रिश्वत मामले में हाई कोर्ट से बरी हुआ कांस्टेबल, अगले ही दिन मौत
अहमदाबाद से एक बेहद दुखद और चौंकाने वाली घटना सामने आई है। मात्र 20 रुपये की रिश्वत से जुड़े एक मामले में करीब 30 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद बरी हुए एक पुलिस कांस्टेबल की अगले ही दिन मौत हो
30 साल पुराने 20 रुपये की रिश्वत मामले में हाई कोर्ट से बरी हुआ कांस्टेबल, अगले ही दिन मौत
अहमदाबाद से एक बेहद दुखद और चौंकाने वाली घटना सामने आई है। मात्र 20 रुपये की रिश्वत से जुड़े एक मामले में करीब 30 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद बरी हुए एक पुलिस कांस्टेबल की अगले ही दिन मौत हो गई।
गुजरात हाई कोर्ट ने 4 फरवरी 2026 को अहमदाबाद के वेजलपुर निवासी कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले के साथ ही दशकों से उनके साथ जुड़ा कलंक आखिरकार मिट गया।
“जिंदगी का दाग मिट गया, अब बस मोक्ष चाहता हूं” — वकील से बोले प्रजापति
फैसले के बाद बाबूभाई प्रजापति अपने वकील के कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने भावुक होकर राहत जताई। उनके वकील, अधिवक्ता नितिन गांधी के अनुसार, प्रजापति ने कहा, “मेरी जिंदगी पर लगा कलंक मिट गया है, अब मेरी इच्छा है कि मुझे मोक्ष मिले।”
वकील ने उन्हें उन सरकारी लाभों के लिए आवेदन करने की सलाह दी, जो इस मामले के कारण वर्षों से रोके गए थे। बताया गया है कि यह बातचीत वकील के कार्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड हो गई थी।
इसके बाद प्रजापति घर लौटे और अगले ही दिन प्राकृतिक कारणों से उनकी मौत हो गई। इस तरह न्याय के लिए उनकी लंबी और पीड़ादायक लड़ाई का अत्यंत मार्मिक अंत हो गया।
1996 में 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप
बाबूभाई प्रजापति पर वर्ष 1996 में 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया था। 1997 में अहमदाबाद सेशंस कोर्ट में उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। 2002 में आरोप तय हुए और 2003 में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई।
2004 में सेशंस कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास और 3,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट में दी थी सजा को चुनौती
प्रजापति ने उसी वर्ष गुजरात हाई कोर्ट में सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती दी, जहां उनकी अपील वर्षों तक लंबित रही।
सुनवाई के दौरान उनके वकील अधिवक्ता नितिन गांधी ने दलील दी कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं और अभियोजन पक्ष की विश्वसनीयता संदिग्ध है। हाई कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए लगभग तीन दशक बाद बाबूभाई प्रजापति को बरी कर दिया।
यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में अत्यधिक देरी की त्रासदी को उजागर करता है, जहां अंततः न्याय मिलने के बावजूद एक व्यक्ति का पूरा जीवन संघर्ष में गुजर गया।
What's Your Reaction?