क्या एक और ब्याज दर कटौती संभव? आज आने वाले RBI MPC के फैसले से क्या उम्मीद करें
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) वित्त वर्ष 2025-26 की अपनी अंतिम बैठक कर चुकी है और आज 6 फरवरी 2026 को अपनी नीतिगत घोषणा करेगी। बीते एक वर्ष में लंबा दर-कटौती चक्र देखने के बाद अब बाजारों में इस बात पर बहस तेज है कि क्या RBI रेपो रेट में एक और कटौती करेगा या फिर..
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) वित्त वर्ष 2025-26 की अपनी अंतिम बैठक कर चुकी है और आज 6 फरवरी 2026 को अपनी नीतिगत घोषणा करेगी। बीते एक वर्ष में लंबा दर-कटौती चक्र देखने के बाद अब बाजारों में इस बात पर बहस तेज है कि क्या RBI रेपो रेट में एक और कटौती करेगा या फिर बदलते व्यापक आर्थिक हालात का आकलन करने के लिए फिलहाल विराम लेगा।
यह नीतिगत समीक्षा एक बेहद अहम मोड़ पर हो रही है। कुछ ही दिन पहले पेश हुए केंद्रीय बजट 2026 में पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में 12% की बढ़ोतरी का प्रावधान किया गया है और राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.3% तय किया गया है। वहीं, बाहरी मोर्चे पर भी हालात कुछ बेहतर दिख रहे हैं—अमेरिका ने भारत पर टैरिफ घटाकर 18% कर दिया है और हाल ही में हुआ भारत–यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौता (FTA) व्यापार प्रवाह और पूंजी आवाजाही को समर्थन देने की उम्मीद जगा रहा है।
पिछले एक साल में MPC पहले ही चार बार ब्याज दरों में कटौती कर चुका है। यह नरमी चक्र फरवरी 2025 में 0.25% की कटौती के साथ शुरू हुआ, इसके बाद अप्रैल में फिर 0.25% और जून में अपेक्षाकृत बड़ी 0.5% की कटौती की गई। अगस्त और अक्टूबर में विराम के बाद दिसंबर में रेपो रेट में एक बार फिर 0.25% की कटौती की गई। अब तक कुल मिलाकर काफी ढील दी जा चुकी है, ऐसे में कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि RBI के पास आगे और कटौती की गुंजाइश सीमित हो गई है।
रेपो रेट: आगे कटौती या यथास्थिति?
विश्लेषकों का कहना है कि यह बैठक रेपो रेट से ज्यादा इस बात पर केंद्रित हो सकती है कि सरकार द्वारा FY27 में प्रस्तावित ₹17.2 लाख करोड़ के विशाल उधारी कार्यक्रम के मद्देनज़र RBI तरलता, बॉन्ड यील्ड और वित्तीय स्थितियों को कैसे संभालता है।
आनंद राठी ग्रुप के सुजन हाजरा का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के खर्च और व्यापार से मिलने वाले सकारात्मक संकेतों के कारण विकास को समर्थन मिल रहा है, लेकिन महंगाई के रुझान आगे की दर कटौती को इस स्तर पर जटिल बना रहे हैं।
उन्होंने कहा, “जहां GDP वृद्धि में हल्की नरमी की उम्मीद है, वहीं सतत सार्वजनिक क्षेत्रीय पूंजीगत व्यय और दो बड़े व्यापार समझौतों से संभावित वृद्धि को सहारा मिल रहा है। ऐसे में मौद्रिक नीति का गणित बेहद संतुलित बना हुआ है।”
उनका यह भी कहना था कि खुदरा महंगाई में धीरे-धीरे बढ़ोतरी के संकेत निकट भविष्य में दर कटौती की तात्कालिक जरूरत को कम कर देते हैं। इसके बजाय, RBI का ध्यान बॉन्ड बाजार में स्थिरता बनाए रखने और तरलता की सुव्यवस्थित स्थिति सुनिश्चित करने पर हो सकता है, न कि नीतिगत दर या रुख में बदलाव पर।
इसी तरह की राय रखते हुए एमके (Emkay) ने कहा कि अमेरिका–भारत व्यापार समझौते के चलते वैश्विक अनिश्चितताएं कुछ हद तक कम हुई हैं, जिससे चालू खाता, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश और रुपये को सहारा मिल सकता है।
एमके ने कहा, “हालांकि वैश्विक मैक्रो और बाजार से जुड़ी कहानियां लगातार बदलती रहती हैं, लेकिन फरवरी 2026 की MPC बैठक को अमेरिका–भारत व्यापार समाधान से बेहतर बाहरी माहौल का लाभ मिलेगा, जो चालू खाते को स्थिर करने में मदद कर सकता है।”
हालांकि, ब्रोकरेज ने यह चेतावनी भी दी कि अनुकूल आधार प्रभाव (base effects) खत्म होने के साथ महंगाई में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है। उसने गहरी मौद्रिक ढील और लगातार तरलता डालने के बावजूद कमजोर मौद्रिक ट्रांसमिशन की ओर भी इशारा किया। एमके का अनुमान है कि सिस्टम में तरलता मार्च FY26 के अंत तक लगभग ₹2.4 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है, जो दिसंबर FY25 के अंत में करीब ₹20,000 करोड़ थी। ऐसे में RBI की ओर से अतिरिक्त समर्थन की जरूरत सीमित रह सकती है।
वैश्विक बैंकिंग दृष्टिकोण से देखें तो वेल्स फार्गो का मानना है कि RBI ब्याज दरों को स्थिर रखते हुए अपना ध्यान तरलता प्रबंधन और यील्ड नियंत्रण पर केंद्रित करेगा।
वेल्स फार्गो के अनुसार, “फरवरी की RBI मौद्रिक नीति में दरों पर विराम देखने को मिल सकता है, जिसमें रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रहने और नीतिगत रुख तटस्थ बने रहने की संभावना है।”
वेल्स फार्गो के संतनु सेनगुप्ता ने कहा कि कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती के बाद केंद्रीय बैंक के जल्दबाजी में और कटौती करने की संभावना कम है। इसके बजाय, RBI खुले बाजार परिचालन (OMO), वेरिएबल रेट रेपो और लक्षित तरलता उपायों का सहारा लेकर ऊंचे सरकारी उधारी स्तर के बीच सरकारी बॉन्ड बाजारों को स्थिर रखने की कोशिश कर सकता है।
उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि RBI मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए संतुलित फॉरेक्स परिचालन और स्वैप्स का इस्तेमाल जारी रखेगा, बिना किसी खास रुपये के स्तर को लक्ष्य बनाए।
कुल मिलाकर, बजट की उधारी गणना, बेहतर होता व्यापारिक माहौल, महंगाई के मजबूत होते संकेत और पहले से ऊंचे तरलता स्तर इस ओर इशारा करते हैं कि 6 फरवरी को रेपो रेट में एक और कटौती देखने को मिलना मुश्किल हो सकता है।
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