तमिलनाडु में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़े कानूनों पर मद्रास हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मद्रास हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह तमिलनाडु सरकार को कुलपतियों (Vice-Chancellors) की नियुक्ति का अधिकार देने वाले विवादित कानूनों पर, जिनमें राज्यपाल की भूमिका को हटाकर राज्य सरकार को अधिकार दिया..

तमिलनाडु में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़े कानूनों पर मद्रास हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
06-02-2026 - 03:11 PM

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मद्रास हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह तमिलनाडु सरकार को कुलपतियों (Vice-Chancellors) की नियुक्ति का अधिकार देने वाले विवादित कानूनों पर, जिनमें राज्यपाल की भूमिका को हटाकर राज्य सरकार को अधिकार दिया गया है, अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर फैसला करे।

शीर्ष अदालत ने 21 मई 2025 को मद्रास हाईकोर्ट द्वारा इन कानूनों पर लगाई गई अंतरिम रोक को हटा दिया। यह निर्णय राज्य सरकार की उस अंडरटेकिंग (लिखित आश्वासन) के आधार पर लिया गया, जिसमें उसने कहा कि हाईकोर्ट के अंतिम फैसले तक कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी

राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह आदेश तमिलनाडु सरकार की अपील पर दिया। राज्य सरकार ने आपत्ति जताई थी कि 21 मई 2025 का अंतरिम आदेश मद्रास हाईकोर्ट ने उन्हें सुने बिना पारित कर दिया।

इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे। पीठ ने स्पष्ट किया,
हम इस मामले के गुण-दोष (मेरिट्स) पर विचार नहीं कर रहे हैं बल्कि इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि आदेश किस प्रक्रिया के तहत पारित किया गया।”

मामले को वापस मद्रास हाईकोर्ट भेजते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “चूंकि मुख्य मामला हाईकोर्ट में लंबित है और 21 मई का आदेश अंतरिम होते हुए भी अपने प्रभाव में अंतिम आदेश जैसा है, इसलिए हम मेरिट्स पर कोई राय नहीं दे रहे हैं। हमारा केवल इतना कहना है कि फैसला सुनाने से पहले राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।”

तकनीकी आधार पर आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने इसे तकनीकी आधार’ बताते हुए कहा, “इसी आधार पर 21 मई का आदेश रद्द किया जाता है और मामला मद्रास हाईकोर्ट को वापस भेजा जाता है।”

CJI की अगुवाई वाली पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि यह मामला या तो वे स्वयं सुनें या अपने द्वारा नामित किसी अन्य न्यायाधीश को सौंपें, क्योंकि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश मणिंदर मोहन श्रीवास्तव की सेवानिवृत्ति में लगभग एक माह ही शेष है।

राज्य का आश्वासन, सुप्रीम कोर्ट की सराहना

अदालत के संकेत पर, राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और पी. विल्सन ने कहा कि हाईकोर्ट का अंतिम फैसला आने तक कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी”। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के इस रुख की सराहना करते हुए हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह मामले का शीघ्र निपटारा करे, अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर

अदालत ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट राज्य सरकार, याचिकाकर्ता और UGC को अपना जवाब दाखिल करने और तर्क रखने के लिए उचित समय दे।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम रोक हटाने का अंतिम निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और 21 मई के आदेश में की गई कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी या राय अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेगी।

राज्य की दलीलें

अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि किसी भी कानून की वैधता तय करने से पहले पूरी सुनवाई होनी चाहिए और उसके बाद ही अंतरिम रोक पर विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “इस आदेश के जरिए राज्य के कानून को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर दिया गया और UGC विनियमों को थोप दिया गया, जबकि राज्य को अभी अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं मिला था।”

पी. विल्सन ने यह भी कहा कि यह आदेश हाईकोर्ट की वकेशन बेंच द्वारा पारित किया गया, जबकि राज्य ने इस पर आपत्ति जताई थी।
उन्होंने कहा, “राज्य अपने विश्वविद्यालयों को लंबे समय तक बिना कुलपति के नहीं छोड़ सकता। यह याचिकाकर्ता विपक्षी दल द्वारा खड़ा किया गया है। हम जो भी नियुक्ति करते हैं, उसके पीछे ये लोग पड़ जाते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे। अदालत ने कहा कि कुलपतियों की नियुक्ति कोई ऐसा अत्यावश्यक विषय नहीं है जिसे वकेशन बेंच के समक्ष लाया जाए, क्योंकि यदि राज्य द्वारा कोई गलत नियुक्ति की जाती है, तो हाईकोर्ट उसे बाद में रद्द कर सकता है।

पीठ ने टिप्पणी की, “ये वैधानिक कानून हैं, जिनके पक्ष में वैधता की धारणा होती है। अंतरिम चरण में ही पूरे कानून को निलंबित कर दिया गया। मामला वकेशन बेंच के पास क्यों गया? यह कोई नया मामला नहीं था। इतनी क्या जल्दी थी कि मानो आसमान ही गिर जाता।”

UGC और याचिकाकर्ता का विरोध

UGC की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दामा सेसादरी नायडू ने राज्य की अपील का विरोध किया।

मेहता ने कहा कि चूंकि तमिलनाडु को केंद्र से अनुदान मिलता है, इसलिए UGC के नियम राज्य पर बाध्यकारी हैं और हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया (prima facie) राज्य के संशोधनों को केंद्रीय नियमों के विपरीत पाया है।

नायडू ने राज्य सरकार द्वारा पीठ पर लगाए गए आरोपों को अनुचित” और “अनैतिक” बताया और कहा कि तमिलनाडु सरकार को जवाब दाखिल करने का अवसर दिया गया था, लेकिन समय लेने के कारण पीठ ने आदेश पारित किया।

हाईकोर्ट का रुख

मद्रास हाईकोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और वी. लक्ष्मीनारायणन शामिल थे, ने 21 मई के आदेश में कहा था, “विवादित संशोधन अधिनियमों में असंवैधानिकता और केंद्रीय कानून से टकराव इतना स्पष्ट है कि हम आंखें बंद नहीं कर सकते। ये संशोधन प्रथम दृष्टया असंवैधानिक हैं। यदि किसी असंवैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने दिया गया, तो इससे अपूरणीय क्षति होगी और जनहित प्रभावित होगा।”

क्या हैं संशोधन?

राज्य सरकार द्वारा किए गए ये संशोधन 18 राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़े हैं। इनमें संबंधित कानूनों में चांसलर” शब्द की जगह सरकार” शब्द जोड़ा गया, जिससे कुलपतियों की नियुक्ति में राज्यपाल/चांसलर की भूमिका समाप्त हो जाती है। इसके अलावा, कुलपतियों को हटाने का अधिकार भी राज्य सरकार के आदेश से जोड़ दिया गया।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।