लिंगायत एक अलग धर्म है, जाति व्यवस्था को समाप्त करना जरूरीः मुख्यमंत्री सिद्धारमैया
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने रविवार को कहा कि लिंगायत एक अलग धर्म है। यह बयान उस बहस को फिर से हवा दे सकता है, जिसमें विपक्ष ने 2013 से 2018 के बीच उन पर वीरशैव-लिंगायत समुदाय को बांटने का आरोप लगाया..
बेंगलुरु। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने रविवार को कहा कि लिंगायत एक अलग धर्म है। यह बयान उस बहस को फिर से हवा दे सकता है, जिसमें विपक्ष ने 2013 से 2018 के बीच उन पर वीरशैव-लिंगायत समुदाय को बांटने का आरोप लगाया था।
सिद्धारमैया ने यह बात लिंगायत सीर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित बसव सांस्कृतिक अभियान 2025 के समापन समारोह में कही। उन्होंने कहा, “हमारे समाज में जाति व्यवस्था गहराई तक जड़ें जमा चुकी है। इस जाति व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए बसवन्ना ने एक अलग धर्म की स्थापना की थी।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब लिंगायत समुदाय के भीतर यह भ्रम बना हुआ है कि क्या उन्हें चल रही सामाजिक-शैक्षणिक जनगणना में खुद को अलग धर्म के रूप में दर्ज कराना चाहिए या हिंदू धर्म के अंतर्गत एक जाति के रूप में।
विपक्षी भाजपा लगातार वीरशैव-लिंगायत समुदाय से अपील कर रही है कि वे खुद को हिंदू समाज का हिस्सा मानते हुए एक जाति के रूप में पहचान दर्ज कराएं ताकि राज्य में हिंदू एकता मजबूत हो। वहीं कांग्रेस नेतृत्व समुदाय को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है।
अपने भाषण की शुरुआत में ही सिद्धारमैया ने कहा कि वह लिंगायत सम्मेलन में अधिक विवादास्पद मुद्दों पर बोलना नहीं चाहते, क्योंकि उनकी कही बात को तुरंत विवाद का रूप दे दिया जाता है।
जाति व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “मैं चातुर्वर्ण व्यवस्था के अनुसार एक शूद्र हूं। लेकिन सिर्फ इसलिए कि मैं शूद्र हूं, इसका मतलब यह नहीं कि मुझे शिक्षा या समानता का अवसर नहीं मिलना चाहिए। जाति किसी को बड़ा या प्रसिद्ध नहीं बनाती... ज्ञान किसी की निजी संपत्ति नहीं है, जिसे किसी से छीना जा सके।”
सिद्धारमैया ने समाज के निचली जातियों और बसवन्ना के सिद्धांतों का पालन करने वालों से अपील की कि वे एकजुट होकर देश में जातिविहीन समाज के निर्माण की दिशा में काम करें।
उन्होंने कहा, “(डॉ. राम मनोहर) लोहिया ने कहा था कि सवर्ण जातियों की रैलियाँ जातिगत एकजुटता का प्रयास होती हैं, लेकिन पिछड़ी जातियों और वंचित वर्गों की रैलियाँ समानता की दिशा में आंदोलन होती हैं। अगर हम समान और मानवीय समाज चाहते हैं, तो हमें इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होना होगा।”
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