अंतिम दिन पर CJI गवई ने बताया, जूता फेंकने वाले वकील को क्यों किया माफ..!
भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में अपने अंतिम दिन, जस्टिस बी.आर. गवई ने पत्रकारों से बातचीत में अपने कार्यकाल की कई अहम घटनाओं का ज़िक्र किया। इनमें वह घटना भी शामिल थी जब एक वरिष्ठ वकील ने उन पर जूता फेंकने की कोशिश..
नयी दिल्ली। भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में अपने अंतिम दिन, जस्टिस बी.आर. गवई ने पत्रकारों से बातचीत में अपने कार्यकाल की कई अहम घटनाओं का ज़िक्र किया। इनमें वह घटना भी शामिल थी जब एक वरिष्ठ वकील ने उन पर जूता फेंकने की कोशिश की थी।
जस्टिस गवई ने कहा, “मुझे लगा कि सबसे सही तरीका यही था कि मैं उस घटना को नज़रअंदाज़ कर दूँ। शायद बचपन से विकसित सोच ने मेरा निर्णय प्रभावित किया। मैंने सोचा कि इसे महत्व न देना ही ठीक होगा।”
अक्टूबर में कोर्ट में हुआ था नाटकीय हमला
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में 71 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश किशोर ने जस्टिस गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की थी। सुरक्षा कर्मियों द्वारा बाहर ले जाए जाते समय उन्होंने कहा था, “सनातन धर्म का अपमान भारत बर्दाश्त नहीं करेगा।”
यह घटना उस विवादास्पद टिप्पणी के बाद हुई थी जिसमें जस्टिस गवई ने मध्य प्रदेश में क्षतिग्रस्त विष्णु प्रतिमा की बहाली से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था, “जाकर खुद देवता से पूछिए।” इस बयान पर देशभर में आलोचना हुई थी।
पहले बौद्ध, दूसरे दलित CJI
जस्टिस बीआर गवई ने मई से नवंबर 2025 तक छह महीने तक CJI के रूप में कार्य किया। वह इस पद पर पहुंचने वाले पहले बौद्ध और दूसरे दलित न्यायाधीश थे।
अब उनके स्थान पर जस्टिस सूर्या कांत CJI बनेंगे। वे अनुच्छेद 370, पेगासस केस और चुनावी सुधारों से जुड़े अहम फैसलों का हिस्सा रहे हैं।
'पोस्ट-रिटायरमेंट नौकरी नहीं लूंगा'
विदाई के दौरान जस्टिस गवई ने कहा कि वह यह पद संतोष और तृप्ति के साथ छोड़ रहे हैं और स्पष्ट किया कि वे कोई भी सरकारी पोस्ट-रिटायरमेंट असाइनमेंट स्वीकार नहीं करेंगे।
उन्होंने कहा, “मैंने पद संभालते ही साफ कर दिया था कि सेवानिवृत्ति के बाद कोई पद नहीं लूंगा। अब 9-10 दिन का कूलिंग-ऑफ रहेगा, फिर नयी पारी शुरू होगी।”
आरक्षण व ‘क्रीमी लेयर’ पर स्पष्ट राय
जस्टिस गवई ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी, जिनमें SC समुदाय में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की बहस भी शामिल है। उन्होंने कहा, “यदि एक ही परिवार को बार-बार लाभ मिलता रहेगा तो वर्ग के भीतर एक नया वर्ग बन जाता है। आरक्षण उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जिन्हें सच में इसकी ज़रूरत है।”
उन्होंने यह भी कहा कि 76 सालों में कई एससी परिवार काफी आगे बढ़ चुके हैं, “अगर पहली पीढ़ी आरक्षण से IAS बन जाए और अगली पीढ़ी भी उसी आधार पर लाभ ले, तो क्या वे वास्तव में वंचित हैं? आरक्षण का उद्देश्य ज़रूरतमंदों तक पहुँचना है।”
कोलेजियम सिस्टम का बचाव
उन्होंने कोलेजियम प्रणाली को न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मुख्य आधार बताया और कहा, “स्वतंत्र न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बना रहना चाहिए। कोलेजियम की आलोचना होती है लेकिन यह न्यायिक स्वायत्तता की रक्षा करता है। स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ सरकार के खिलाफ निर्णय देना नहीं, बल्कि मामलों को निष्पक्षता और मेरिट के आधार पर तय करना है।”
महिला जज की नियुक्ति न कर पाने का अफसोस
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अपने कार्यकाल में वे किसी महिला जज को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त नहीं कर पाए, पर यह ‘इरादे की कमी’ नहीं थी, “कई नामों की समीक्षा हुई लेकिन कोलेजियम में सर्वसम्मति नहीं बन पाई।”
गवर्नर बिल-अप्रूवल केस पर स्पष्टीकरण
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के बिलों पर फैसले की समय-सीमा से संबंधित प्रावधान हटाए थे लेकिन साथ ही कहा था कि गवर्नर अनिश्चितकाल तक बिल लंबित नहीं रख सकते।
उन्होंने कहा, “संविधान शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है। कानून बनाना संसद का काम है। लेकिन हमने यह भी स्पष्ट किया है कि अत्यधिक देरी होने पर न्यायिक समीक्षा उपलब्ध रहेगी।”
20 नवंबर के फैसले पर प्रतिक्रिया
20 नवंबर को जस्टिस गवई की अगुवाई वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे विपक्षी शासित राज्यों की प्रारंभिक आपत्तियाँ खारिज कीं और माना कि न्यायालय का सलाहकारी अधिकार संविधान की व्याख्या में अत्यंत आवश्यक है।
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