‘बेहद निराशाजनक’: अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भारत–ईयू व्यापार समझौते की आलोचना की, कहा कि यूरोप ने यूक्रेन के लोगों से ऊपर व्यापार को रखा
अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भारत के साथ एक बड़े व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के यूरोप के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि इस कदम से यह साफ होता है कि यूरोप ने यूक्रेन के लोगों के प्रति अपनी घोषित चिंता से ऊपर अपने कारोबारी हितों को प्राथमिकता..
अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भारत के साथ एक बड़े व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के यूरोप के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि इस कदम से यह साफ होता है कि यूरोप ने यूक्रेन के लोगों के प्रति अपनी घोषित चिंता से ऊपर अपने कारोबारी हितों को प्राथमिकता दी है।
इस सप्ताह CNBC को दिए एक इंटरव्यू में बेसेंट ने कहा कि भारत के साथ इस मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के हालिया फैसले से वे यूरोपीय देशों से “बेहद निराश” हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोप “एक तरफ तो यूक्रेन का समर्थन करने की बात करता है, जबकि दूसरी ओर अप्रत्यक्ष रूप से रूस को वित्तीय मदद दे रहा है, ताकि वह यूक्रेन के खिलाफ अपनी जंग जारी रख सके।”
भारत–ईयू व्यापार समझौते पर नाराजगी क्यों?
बेसेंट ने कहा, “उन्हें अपने हित में जो सही लगे, वह करना चाहिए, लेकिन मैं यह जरूर कहूंगा कि मुझे यूरोपीय रुख बेहद निराशाजनक लगा।”
उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की, जब एक दिन पहले ही यूरोपीय संघ ने भारत के साथ लंबे समय से प्रतीक्षित व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया था। इस समझौते का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाना और अमेरिका पर यूरोप की निर्भरता को कम करना है।
अमेरिका यूरोप की आलोचना क्यों कर रहा है?
इस समझौते के तहत, मूल्य के हिसाब से लगभग 96.6% वस्तुओं पर शुल्क या तो पूरी तरह हटाए जाएंगे या कम किए जाएंगे। इससे 2032 तक भारत को होने वाले यूरोपीय निर्यात में संभावित रूप से दोगुनी वृद्धि हो सकती है और यूरोपीय कंपनियों को शुल्क के रूप में करीब 4 अरब यूरो का लाभ मिलने का अनुमान है।
बेसेंट के मुताबिक, यही समझौता इस बात की भी वजह है कि पिछले साल भारतीय वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाने के अमेरिकी कदम का यूरोपीय संघ ने समर्थन नहीं किया।
भारत–ईयू समझौते को बेसेंट कैसे देखते हैं?
उन्होंने कहा, “यूरोपीय हमारे साथ आने को तैयार नहीं थे और अब यह स्पष्ट है कि इसकी वजह यह व्यापार समझौता था।”
उन्होंने आगे जोड़ा, “इसलिए जब भी आप किसी यूरोपीय नेता को यूक्रेन के लोगों के महत्व पर बात करते सुनें, तो याद रखें कि उन्होंने यूक्रेन के लोगों से पहले व्यापार को रखा।”
बेसेंट ने यह आरोप भी लगाया कि यूरोपीय देश रूस से जुड़े कच्चे तेल से बने परिष्कृत ईंधन की खरीद के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से रूस की जंग को वित्तपोषित कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “रूसी तेल भारत आता है, वहां उसका परिष्करण होता है और फिर वही परिष्कृत उत्पाद यूरोप खरीदता है।”
भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौता क्या है?
भारत और यूरोपीय संघ ने मंगलवार को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। अधिकारियों ने इसे नई दिल्ली द्वारा किया गया सबसे व्यापक व्यापार समझौतों में से एक बताया है, जिसमें बाजार तक पहुंच के साथ-साथ भविष्य में संभावित नियामकीय झटकों से बचाव के प्रावधान भी शामिल हैं।
इस समझौते के तहत भारत को यूरोपीय संघ की 96.8% टैरिफ लाइनों पर तरजीही बाजार पहुंच मिलेगी, जो ब्लॉक को होने वाले भारत के 99.5% निर्यात को कवर करती है। मूल्य के आधार पर भारत के 90.7% निर्यात समझौते के लागू होते ही शुल्क-मुक्त हो जाएंगे। यह किसी भी व्यापार समझौते में भारत द्वारा हासिल की गई सबसे गहरी टैरिफ उदारीकरण प्रतिबद्धताओं में से एक है।
इससे भारत के कपड़ा उद्योग, बहुमूल्य रत्न, आभूषण और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।
वहीं, भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध फिलहाल तनावपूर्ण बने हुए हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% तक के शुल्क लगाए हैं, जिनमें रूस से तेल खरीदने पर 25% का टैरिफ भी शामिल है। बेसेंट की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि अमेरिका, भारत और यूरोप के बीच बढ़ते आर्थिक रिश्तों को अपनी वैश्विक रणनीति और प्रतिबंध व्यवस्था के लिए एक चुनौती के रूप में देख रहा है।
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