रूस को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने की तैयारी: चीन में तैनात एस-400 डिफेंस सिस्टम नहीं रोक पाया
<p><em><strong>भारत की ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को देश का ब्रह्मास्त्र कहा जाता है। यह किसी भी सशस्त्र बल में शामिल इकलौती सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। ये मिसाइल इतनी खास है कि चीन में तैनात एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और तो और पश्चिमी देशों के साथ कई नाटो देश भी इस मिसाइल को खरीदने में अपनी दिलचस्पी दिखा चुके हैं। </strong></em></p>
ब्रह्मोस एरोस्पेस के सीईओ और एमडी अतुल दिनकर ने एक अंतरराष्ट्रीय मैगजीन को दिए इंटरव्यू में इस मिसाइल की खूबियों और क्षमताओं पर खुलकर बात की। अतुल ने बताया कि जब उन्होंने ब्रह्मोस मिसाइल बनाने की शुरुआत की थी, तब दुनिया में ऐसी कोई डिफेंस प्रणाली नहीं थी, जो इसका सामना कर सके। हालांकि, अब उन्होंने कुछ ऐसे एंटी-मिसाइल सिस्टम्स के बारे में सुना है जो काफी एडवांस्ड हैं, लेकिन ब्रह्मोस के ऑपरेशन पर ये कितना असर डाल सकते हैं, इसे लेकर ज्यादा साक्ष्य नहीं मिले हैं।
रूसी एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम कितना प्रभावी
फिलहाल बहुत कम देशों के पास एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम है। ब्रह्मोस के लॉन्च होने के बाद टारगेट लोकेशन पर इसके प्रभाव के बीच बहुत कम समय होता है, इसलिए किसी भी जमीन से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम के लिए इसे रोक पाना मुश्किल है। सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को रोकना नामुमकिन है। अगर कोई डिफेंस सिस्टम ऐसा करने में कामयाब हो भी गया तो वो सिर्फ 1, 2 या 3 को रोक पाएगा। एक साथ 5-6 के सैल्वो को रोकना संभव नहीं है। ये मिसाइल किसी न किसी तरह अपने टारगेट तक पहुंच ही जाएंगी।
रूस ने इसे अपनी मिलिट्री में क्यों नहीं लिया
रूसी एस-800 ओनिक्स मिसाइल ब्रह्मोस का एक पुराना वर्जन है। ब्रह्मोस इससे कहीं बेहतर है। एस-800 को रूस में बनाया जाता था और ये अब भी वहीं बनती है। अगर उन्होंने इसे तब खरीदा होता, तो उनके पास मौजूदा स्थिति में इस्तेमाल करने के लिए बहुत सी चीजें होतीं। यूरोप में चल रहे हालात बेहतर होने के बाद हमें रूस से ब्रह्मोस मिसाइल के लिए कुछ ऑर्डर मिल सकते हैं। उनके पास ब्रह्मोस जैसी कोई क्रूज मिसाइल नहीं है। हवा में लॉन्च होने वाली ब्रह्मोस मिसाइल जैसी दुनिया में कोई मिसाइल नहीं है। मैं इसे एक्सपोर्ट के मामले में गेम-चेंजर के तौर पर देखता हूं।
अब तक कौन-कौन से देशों के साथ ब्रह्मोस की डील हुई
ब्रह्मोस बेचने के लिए पहला कॉन्ट्रैक्ट फिलिपीन्स के रक्षा मंत्रालय के साथ किया। ये उनके समुद्री दल के लिए है। ये बहुत बड़ा कॉन्ट्रैक्ट नहीं था, लेकिन ये एक अच्छी शुरुआत है। नाटो सदस्यों सहित कई पश्चिमी देश इसमें अपनी दिलचस्पी दिखा चुके हैं। वे सभी ब्रह्मोस चाहते हैं। एक विदेशी नेवल चीफ ने मुझसे कहा था- मैं कभी भी ब्रह्मोस के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहूंगा। मैं इसे हमेशा अपनी पक्ष में देखना चाहूंगा।
दुनिया के हर कोने से आ रही डिमांड
ब्रह्मोस से डील होने के बाद हम साउथ ईस्ट एशियाई देशों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। कई मिडिल ईस्ट और अफ्रीकी देशों ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है। लेटिन अमेरिका के देश भी ब्रह्मोस के लिए हमसे बातचीत कर रहे हैं। ये एक महंगी मिसाइल है। इसे खरीदने से पहले किसी भी देश को इसकी जरूरत को लेकर सही आकलन करने की जरूरत है। साथ ही, उन्हें ये भी इवैल्यूएट करना होगा कि क्या वो हमारे साथ इतने बड़े लेवल पर पार्टनरशिप करना चाहते हैं।
हाइपरसोनिक के दौर में ब्रह्मोस की शेल्फ लाइफ कितनी है?
अगर हमने 2005 में डिलीवरी शुरू की, तो हमें 20 साल से भी कम समय हुआ है। ब्रह्मोस लंबे समय तक काम आने वाली मिसाइल है। अभी भी दुनिया में सबसोनिक मिसाइल इस्तेमाल हो रही है। ऐसे में सुपरसोनिक मिसाइल हमेशा एक कदम आगे रहेगी। हो सकता है हम आगे चलकर ब्रह्मोस का हाइपरसोनिक वर्जन भी तैयार करें। इससे हम एक कदम और आगे पहुंच जाएंगे।
हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल पर अभी सिर्फ रिसर्च
हम ब्रह्मोस न्यू जेनरेशन पर फोकस कर रहे हैं, क्योंकि ये बिजनेस के लिहाज से भी हमारे लिए बेहतर है। जब हम वर्तमान टेक्मोलॉजी में महारत हासिल कर लेंगे तो ब्रह्मोस हाइपरसोनिक पर काम शुरू करेंगे। फिलहाल तो ये सिर्फ रिसर्च का हिस्सा है। सेना में ऐसा कोई क्रूज हथियार शामिल नहीं है जो पूरी तरह से हाइपरसोनिक हो। बैलिस्टिक मिसाइलें हाइपरसोनिक हैं, वे मैक 6-प्लस पर चलती हैं, लेकिन वो क्रूज मिसाइल नहीं होतीं। हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल पर अभी सिर्फ रिसर्च हो रही है।
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