Apara Ekadashi : आज है अपरा एकादशी, जानें मुहूर्त महत्त्व व ज़रूर पढ़ें पुण्य प्रदान करने व्रत कथा
<p>अपरा एकादशी सोमवार, मई 15, 2023 को<br /> एकादशी तिथि प्रारम्भ - मई 15, 2023 को 02:46 ए एम <br /> एकादशी तिथि समाप्त - मई 16, 2023 को 01:03 ए एम</p> <p>पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 16 मई को 06:41 ए एम से 08:13 ए एम<br /> पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय - 06:41 ए एम</p>
अपरा एकादशी का माहात्म्य
अर्जुन ने कहा- "हे प्रभु! ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसका माहात्म्य क्या है? इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत को करने का क्या विधान है? कृपा कर यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतायें।"
श्रीकृष्ण ने कहा- "हे अर्जुन! ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा है, क्योंकि यह अपार धन और पुण्यों को देने वाली तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इसका व्रत करते हैं, उनकी लोक में प्रसिद्धि होती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, प्रेत योनि, दूसरे की निन्दा आदि से उत्पन्न पापों का नाश हो जाता है, इतना ही नहीं, स्त्रीगमन, झूठी गवाही, असत्य भाषण, झूठा वेद पढ़ना, झूठा शास्त्र बनाना, ज्योतिष द्वारा किसी को भरमाना, झूठा वैद्य बनकर लोगो को ठगना आदि भयंकर पाप भी अपरा एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाते हैं।
अपरा एकादशी व्रत कथा
एक बार भगवान श्रीकृष्ण से युधिष्ठिर ने कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का महत्व बताने का निवेदन किया. तब उन्होंने कहा कि इस एकादशी को अपला एकादशी कहते हैं और इससे ब्रह्म हत्या, प्रेत योनि आदि से मुक्ति मिल जाती है. साथ ही कथा सुनाते हुए कहा कि एक समय एक राज्य में महीध्वज नाम का राजा राज्य करता था. उसका एक छोटा भाई भी था, जिसका नाम था व्रजध्वज. वो बेहद अधर्मी और पापी था. वह अन्याय के मार्ग पर चलने वाला और अपने भाई महीध्वज से द्वेष करने वाला था.
एक बार उसने अपने भाई के खिलाफ षड्यंत्र रचा और उसकी हत्या कर दी. हत्या के बाद अपने भाई का शव जंगल में ले गया और पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया. चूंकि राजा महीध्वज की अकाल मृत्यु हुई थी इसके कारण उन्हें प्रेत योनि में जाना पड़ा और वह प्रेत आत्मा बनकर पीपल के पेड़ पर ही रहने लगे. प्रेतात्मा बनने के बाद राजा वहां पर उत्पात मचाने लगा तब 1 दिन उस पीपल के पेड़ के सामने से धौम्य ऋषि गुजर रहे थे. तब उन्होंने उस प्रेत को पीपल के पेड़ पर देखा और वह उसे देखते ही समझ गए कि यह तो वह राजा है. तब उन्होंने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पेड़ से नीचे उतारा और उसे परलोक विद्या के बारे में बताया.
उन्होंने उस प्रेतात्मा राजाओं को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए खुद एकादशीे का व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की. उन्होंने भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करके यह मांगा कि उस प्रेतात्मा राजा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाए. भगवान विष्णु धौम्य ऋषि की पूजा से प्रसन्न हुए और प्रेतात्मा राजा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई. उसके बाद राजा ने दिव्य शरीर धारण कर धौम्य ऋषि को प्रणाम किया और पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग में चला गया.
"अपरा अर्थात अपार या अतिरिक्त, जो प्राणी एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें भगवान श्रीहरि विष्णु की अतिरिक्त भक्ति प्राप्त होती है। भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है।"
What's Your Reaction?