ट्रम्प की योजना: दवाओं पर 200% टैरिफ, अमेरिका में महंगाई और कमी का खतरा
डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने आयातित दवाओं पर भारी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि कुछ दवाओं पर शुल्क 200% तक हो सकता है। अभी तक ये टैरिफ मुख्यतः ऑटो और स्टील जैसे सामानों पर लागू थे, लेकिन अब इसे फार्मास्यूटिकल क्षेत्र तक बढ़ाने की योजना है। यह दशकों की उस नीति से बड़ा बदलाव होगा, जिसके तहत कई दवाएँ..
वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने आयातित दवाओं पर भारी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि कुछ दवाओं पर शुल्क 200% तक हो सकता है। अभी तक ये टैरिफ मुख्यतः ऑटो और स्टील जैसे सामानों पर लागू थे, लेकिन अब इसे फार्मास्यूटिकल क्षेत्र तक बढ़ाने की योजना है। यह दशकों की उस नीति से बड़ा बदलाव होगा, जिसके तहत कई दवाएँ अमेरिका में ड्यूटी-फ्री लायी जाती थीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति दवाओं की कीमतें बढ़ा सकती है और सप्लाई चेन में बाधा डाल सकती है। कमी (shortages) का गंभीर खतरा है।
ट्रम्प के 200% फार्मा टैरिफ – क्या प्रस्ताव है?
- यह कदम ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट 1962 की धारा 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उठाया जा रहा है।
- तर्क है कि COVID-19 महामारी के दौरान हुई दवा की कमी और स्टॉकपाइलिंग से सीख लेकर घरेलू उत्पादन बढ़ाना ज़रूरी है।
- हाल ही में अमेरिका–यूरोप व्यापार समझौते में यूरोपीय दवाओं पर पहले ही 15% टैरिफ लगाया गया था। अब और ऊँचे शुल्क लगाने की धमकी दी जा रही है।
प्रभाव और समयसीमा
- व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि टैरिफ लागू करने में 1 से 1.5 साल की देरी हो सकती है, ताकि कंपनियों को समायोजन का समय मिले।
- कई कंपनियाँ पहले ही आयात बढ़ा चुकी हैं और 6 से 18 महीने का स्टॉक अमेरिका में बना लिया है।
- विश्लेषकों का कहना है कि यदि टैरिफ 2026 के अंत तक शुरू होता है, तो असर 2027-28 से महसूस होगा।
- अल्पकाल में व्यवधान मामूली होगा, लेकिन दीर्घकाल में लागत और सप्लाई पर दबाव बढ़ेगा।
उपभोक्ताओं पर असर
- ING के डीडरिक स्टैडिग का कहना है –
“टैरिफ का सबसे ज़्यादा नुकसान उपभोक्ताओं को होगा। उन्हें दवा खरीदते समय सीधे महंगाई झेलनी पड़ेगी और बीमा प्रीमियम में अप्रत्यक्ष रूप से।” - गरीब परिवार और बुजुर्ग मरीज़ सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
- अनुमान है कि सिर्फ 25% टैरिफ भी अमेरिकी दवाओं की कीमतें 10-14% तक बढ़ा देगा।
सबसे अधिक जोखिम वाली दवाएँ
- अमेरिका की 92% प्रिस्क्रिप्शन दवाएँ जेनेरिक्स हैं।
- जेनेरिक निर्माता कम मुनाफे पर काम करते हैं इसलिए बड़े टैरिफ झेलना मुश्किल होगा। कई कंपनियाँ अमेरिकी बाज़ार छोड़ सकती हैं।
सप्लाई चेन फिर से क्यों मुश्किल है?
- दशकों से कंपनियाँ उत्पादन चीन, भारत, आयरलैंड और स्विट्ज़रलैंड में शिफ्ट कर चुकी हैं।
- अमेरिका का दवाओं में सालाना 150 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है।
- 97% एंटीबायोटिक्स, 92% एंटीवायरल और 83% लोकप्रिय जेनेरिक्स में कम से कम एक घटक विदेश में बनता है।
- फैक्ट्रियाँ बनाना सालों का काम है और बेहद महँगा है।
उद्योग की प्रतिक्रिया
- Roche ने अप्रैल में अमेरिका में 50 अरब डॉलर निवेश की घोषणा की है।
- Johnson & Johnson अगले चार साल में 55 अरब डॉलर का निवेश करेगी।
- लेकिन, विदेशी active ingredients की निर्भरता तुरंत खत्म नहीं होगी।
सलाहकारों की राय
- PwC की मायटी परेरा ने कहा, “यह इंडस्ट्री जीरो (टैरिफ) से सीधे 200% तक के झटके में है।”
- उन्होंने चेतावनी दी, “सिर्फ तभी बचाव होगा जब पूरी सप्लाई चेन अमेरिका में ही बनाई जाए।”
क्या सच में 200% टैरिफ लगेगा?
- कई विश्लेषक मानते हैं कि इतना ऊँचा शुल्क हर दवा पर लागू नहीं होगा।
- कम मुनाफे वाली जेनेरिक्स को छूट मिल सकती है।
- लेकिन अनिश्चितता ही बाज़ार बदलने के लिए काफी है। कुछ कंपनियाँ अमेरिकी दवा पोर्टफोलियो छोटा कर सकती हैं।
भारत की भूमिका
- भारत वैश्विक जेनेरिक दवाओं का बड़ा सप्लायर है।
- भारतीय फार्मा उद्योग को फिलहाल अमेरिकी टैरिफ से छूट मिली है क्योंकि जेनेरिक दवाएँ अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए “महत्वपूर्ण” हैं।
- भारत की हिस्सेदारी अमेरिकी फार्मा आयात में लगभग 6% है।
पिछले झटके से सबक
- भारत में एक फैक्ट्री के बंद होने से कैंसर की दवाओं की भारी कमी हुई थी।
- विशेषज्ञों का कहना है कि दवा बाज़ार लचीला नहीं है, झटकों से जल्दी उबर नहीं पाता।
- मार्टा वोसिंस्का (ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन) ने कहा –
“यदि हम चाहते हैं कि सब कुछ अमेरिका में बने, तो हमें बहुत पैसा खर्च करना होगा। अभी हमने सस्ती दवाओं के लिए सप्लाई चेन विदेशों में दी हुई है। इसे उलटने के लिए पूरे सिस्टम को फिर से डिजाइन करना होगा। सवाल है – हम कितनी कीमत चुकाने को तैयार हैं?”
कानूनी और राजनीतिक मुश्किलें
- अमेरिकी संघीय सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स ने टैरिफ के कुछ हिस्सों को खारिज किया है, यह कहते हुए कि इतने बड़े आर्थिक कदम सिर्फ राष्ट्रपति नहीं, बल्कि कांग्रेस को मंज़ूर करने होंगे।
- यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।
- राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है। ट्रम्प कंपनियों से डेटा मांग रहे हैं और सोशल मीडिया पर नई घोषणाएँ कर रहे हैं।
निष्कर्ष
- फिलहाल स्टॉकपाइल होने से तत्काल कमी टल सकती है।
- लेकिन अगर टैरिफ लंबे समय तक रहे और सप्लाई चेन न बदली, तो कीमतें बढ़ेंगी और कमी होगी।
- मरीजों और पॉलिसी-निर्माताओं के सामने कठिन विकल्प है..
- अमेरिका में उत्पादन क्षमता बढ़ाकर सप्लाई को सुरक्षित बनाना
- या दवाओं को सस्ती और आसानी से उपलब्ध बनाए रखना।
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