संस्था को बदनाम करने की इजाज़त नहीं देंगे: NCERT विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

कक्षा 8 की NCERT की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में “भ्रष्टाचार” से जुड़े अध्याय को लेकर Supreme Court ने बुधवार को गहरी चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि देश भर के सभी उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश इस मुद्दे को लेकर “व्यथित” हैं और अदालत किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं..

संस्था को बदनाम करने की इजाज़त नहीं देंगे: NCERT विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
26-02-2026 - 01:34 PM
26-02-2026 - 01:43 PM

कक्षा 8 की NCERT की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में “भ्रष्टाचार” से जुड़े अध्याय को लेकर Supreme Court ने बुधवार को गहरी चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि देश भर के सभी उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश इस मुद्दे को लेकर “व्यथित” हैं और अदालत किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं देगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने इस मामले का संज्ञान ले लिया है और आवश्यकता पड़ी तो स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) कार्रवाई की जा सकती है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “कृपया कुछ दिन प्रतीक्षा करें। बार और बेंच—दोनों ही व्यथित हैं। सभी हाईकोर्ट के जज व्यथित हैं। मैं इस मामले को स्वतः संज्ञान में लूंगा। मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना रास्ता लेगा।”

शीर्ष अदालत की यह प्रतिक्रिया उस समय आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal ने मंगलवार को अदालत को बताया कि NCERT कक्षा 8 के छात्रों को “न्यायिक भ्रष्टाचार” पढ़ा रही है, जो अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है।
सिब्बल ने इससे पहले सोशल मीडिया मंच X पर लिखा था, “NCERT की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक सेक्शन है! फिर राजनेताओं, मंत्रियों, लोक सेवकों और जांच एजेंसियों में व्यापक भ्रष्टाचार का क्या? क्या उन्हें कालीन के नीचे छिपा दिया जाए?”

न्यायपालिका पर शिकायतों का खुलासा

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब कुछ दिन पहले विधि मंत्रालय ने खुलासा किया था कि 2016 से 2025 के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ कुल 7,528 शिकायतें मिलीं।

14 फरवरी को सांसद मैथेस्वरन वीएस के प्रश्न के लिखित उत्तर में Ministry of Law and Justice ने बताया कि उच्च न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ शिकायतों को न्यायपालिका द्वारा विकसित “इन-हाउस मैकेनिज्म” के तहत निपटाया जाता है।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “संस्था के प्रमुख के रूप में मैंने अपना कर्तव्य निभाया है और संज्ञान लिया है। यह एक सोची-समझी कोशिश लगती है… मैं इससे अधिक कुछ नहीं कहूंगा।”

NCERT का अध्याय क्या कहता है

NCERT ने अपनी नई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर एक अनुभाग जोड़ा है। यह पहले के संस्करणों से एक बड़ा बदलाव है, जिनमें मुख्य रूप से अदालतों की संरचना और भूमिका पर ही ध्यान दिया जाता था।

वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi ने भी इस पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “चयनात्मकता, माय लॉर्ड… चयनात्मकता। अन्य क्षेत्रों में भी यह मौजूद है लेकिन न्यायिक भ्रष्टाचार को ही क्यों?”

इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की, “यह किताब तो बुनियादी ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) के ही खिलाफ जाती हुई प्रतीत होती है।”

संशोधित अध्याय का शीर्षक है—हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका”। इसमें न सिर्फ अदालतों के ढांचे और न्याय तक पहुंच की बात की गई है, बल्कि न्यायिक प्रणाली के सामने मौजूद चुनौतियों—जैसे भ्रष्टाचार और लंबित मामलों—को भी शामिल किया गया है।

अध्याय में लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए हैं:

  • सुप्रीम कोर्ट: लगभग 81,000 मामले
  • हाईकोर्ट: करीब 62,40,000 मामले
  • जिला और अधीनस्थ अदालतें: लगभग 4,70,00,000 मामले

भ्रष्टाचार वाले हिस्से में किताब कहती है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न सिर्फ अदालत में बल्कि उनके निजी आचरण पर भी लागू होती है। इसमें न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही व्यवस्था का उल्लेख है और शिकायतें दर्ज कराने की प्रक्रिया के लिए CPGRAMS (सेंट्रलाइज़्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम) का भी हवाला दिया गया है।

अध्याय में यह भी कहा गया है कि पारदर्शिता और जनता के भरोसे को मजबूत करने के लिए राज्य और केंद्र—दोनों स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें तकनीक का उपयोग और भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई शामिल है।

पूर्व CJI का उद्धरण भी शामिल

पाठ्यपुस्तक में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश BR Gavai के जुलाई 2025 के एक बयान का भी उल्लेख है। उन्होंने कहा था, “न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और दुराचार की घटनाएं जनता के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। हालांकि, इस भरोसे को दोबारा कायम करने का रास्ता इन मुद्दों के समाधान के लिए त्वरित, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई में निहित है… पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक मूल्य हैं।”

वकीलों की आपत्तियां

वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि स्कूली शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को शिक्षित करना है, न कि उनके मन को उलझाना। उन्होंने कहा, “आठवीं कक्षा जैसे शुरुआती स्तर पर उद्देश्य यह होता है कि छात्रों को शासन के अंगों और उनके कार्यों से परिचित कराया जाए—जैसे संसद क्या करती है, न्यायपालिका कैसे काम करती है और कार्यपालिका विधायी नीतियों को कैसे लागू करती है। इस स्तर पर बच्चों को पहले शासन की संरचना समझनी चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट की वकील प्रज्ञा परिजात सिंह ने कहा कि बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के ‘भ्रष्टाचार’ शब्द का उल्लेख समझ की कमी को दर्शाता है।
उन्होंने कहा, “न्यायपालिका ने हमेशा बेहतर कानूनों के लिए प्रयास किया है। हर चीज के पक्ष और विपक्ष होते हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र को गढ़ने में न्यायपालिका की भूमिका का विश्लेषण किए बिना इस तरह से इसे बच्चों के सामने रखना गलत है।”

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यह कम उम्र के, प्रभाव में आने वाले बच्चों के सामने न्यायपालिका की छवि को नकारात्मक रूप में पेश करने का एक खुला तरीका है।
उन्होंने सवाल उठाया, “हम सभी जानते हैं कि Keshavananda Bharti जैसे मामलों में न्यायपालिका ने संविधान की ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ जैसी अहम अवधारणा देकर भारतीय लोकतंत्र की रक्षा की। इसका जिक्र क्यों नहीं किया गया?”

यह विवाद अब सिर्फ पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बड़े सवाल को सामने ला रहा है कि स्कूली शिक्षा में संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना किस सीमा तक और किस संदर्भ में की जानी चाहिए।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।