फिल्म समीक्षाः आयुष्मान खुराना और शेफाली शाह के लिए देख सकते हैं Doctor G
<p><em><strong>नयी रिलीज फिल्म 'डॉक्टर जी' में आयुष्मान हैं और वे एक ऐसे अभिनेता हैं जो कुछ 'अलग हटके' टाइप रोल्स से घबराते नही बल्कि उसमे जान डाल देते हैं। इसी वजह से उनकी फिल्म आते ही दर्शकों की उनसे उम्मीदें बढ़ जाती है। लेकिन, उनकी इस फिल्म की कहानी घिसीपिटी है। सैकड़ों दफ़ा हम ऐसी कहानियां देख चुके हैं पर इसके कुछ एलिमेंट्स नए जरूर हैं। ट्रीटमेंट पूरी तरह से नहीं पर कई मामलों में फ्रेश है। पढ़ाई से लेकर पेशे तक स्त्री-पुरुष के बीच समाज ने एक लाइन खींच दी है। औरत और मर्द एक दूसरे के निर्धारित काम नहीं कर सकते। इसी मुद्दे को फ़िल्म ऐड्रेस करती है।</strong></em></p>
डॉक्टर जी फिल्म मेल गाइनीकोलॉजिस्ट के बारे में है। पुरुष गाइनेकोलॉजिस्ट के पास जाने में एक तरफ जहां महिला को हिचकिचाहट होती है तो वहीं पुरुष भी इस क्षेत्र में एडमिशन लेने से हिचकते हैं। यही कहानी है फिल्म डॉक्टरजी के नायक उदय गुप्ता (आयुष्मान खुराना) की। बनना तो वह चाहता है हड्डी रोग विशेषज्ञ लेकिन पीजी के लिए उसे एडमिशन नहीं मिलता तो मन मार कर गाइनोकॉलोजी विभाग में एडमिशन लेना पड़ता है। कॉलेज में सीनियर लड़कियां द्वारा रेगिंग, अजीबों-गरीब परिस्थितियों में सीनियर्स की नाराजगी इत्यादि से गुजरना पड़ता है जिसकी वजह से उसका काम में मन नहीं लगता और वह महिलाओं के पास जाने में डरता है
डॉक्टर जी की मुख्य कहानी के साथ-साथ स्क्रीन प्ले राइटर्स (सुमिता सक्सेना, सौरभ भारत, विशाल वाघ, अनुभूति कश्यप) ने कुछ और बातें भी जोड़ी हैं। उदय की मां जब टिंडर पर अपना साथी चुनती है तो वह अपनी मां को कहता है कि लोग क्या कहेंगे? यानी उदय और उसकी मां के दृष्टिकोण के जरिये युवा अपने माता-पिता के बारे में सोचते हुए संकीर्णवादी हो जाते हैं जबकि खुद के बारे में सोचते हुए आधुनिकता को अपनाते हैं इसकी झलक दिखाई है।
उदय के दिमाग में पुरुष होने को लेकर दंभ है। वह क्रिकेट को लड़कों का और बैडमिंटन को लड़कियों का खेल मानता है। उसकी यही सोच प्रोफेशन में भी आड़े आ जाती है जब अपनी मरीज स्त्रियों का इलाज करते समय 'मेल टच' से मुक्त नहीं हो पाता। क्या लड़के और लड़की दोस्त नहीं हो सकते? यह बात स्क्रिप्ट राइटर्स ने उदय और फातिमा के रिश्ते के जरिये बहुत अच्छे से दर्शाई है।
एक्टिंग की बात करें तो आयुष्मान खुराना ने अपना रोल सहजता से निभाया है। उनके लुक्स और एक्टिंग में अपनी पिछली फिल्मों से कुछ अलग हटके नही है। रकुल प्रीत सिंह को कम सीन मिले, लेकिन इसमें भी उनका अभिनय अपनी अन्य फिल्मों की तरह ही साधारण ही है। शीबा चड्ढा आयुष्मान की मां के किरदार में हैं और उन्होंने गजब की एक्टिंग है। क्या बड़ी उम्र की महिलाओं को अपनी जिंदगी जीने का हक नहीं है। इस सवाल को उन्होंने उठाया है और बखूबी उठाया है। वो फिल्म में एक अलग ही फ्लेवर डालती हैं औऱ जब भी स्क्रीन पर आती हैं आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। पूरी फिल्म में शैफाली शाह एक्टिंग में एक्टिंग में नंबर वन रहीं। वे एक सॉलिड एक्ट्रेस हैं, इस बात का सबूत उनकी हर अगली फिल्म में मिल जाता है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर, देव डी जैसी फिल्मों की असिस्टेंट डायरेक्टर रह चुकीं अनुभूति कश्यप 'डॉक्टर जी' से निर्देशक के रूप में डेब्यू कर रही हैं। अनुभूति ने बेशक इस फिल्म के जरिये एक अलग कहानी चुनी है लेकिन स्क्रिनप्ले और कहानी के बिखराव की वजह से फिल्म से आप ज्यादा कनेक्ट महसूस नहीं कर पाते हैं। कुछ सीन्स को छोड़ दिया जाय तो इंटरवल तक आते-आते आप ऊब जाते हैं। कहानी में कुछ इंट्रेस्टिंग मोड़ आते हैं जिसमे थोड़ी बहुत दिलचस्पी जगती है। ओवरऑल दो घंटे का टाइमफ्रेम पर भी बोझिल सी लगती है. दरअसल इसका सबसे बड़ा ड्रॉ-बैक यही है कि किसी एक टॉपिक पर फोकस न होकर कई और मुद्दों को जबरदस्ती घुसाने की कोशिश की गई है। मसलन एक लड़के का गाइनी डिपार्टमेंट में होता स्ट्रगल, सिंगल मां की ख्वाहिशें, जेंडर इन-इक्वालिटी, रैगिंग, मेल टच (इगो) आदि कई पहलुओं को टच करती फिल्म किसी एक खास मुद्दे पर आकर नहीं रुकती है और यही वजह से कि आप फिल्म से कनेक्शन बना पाने में हेल्पलेस महसूस करने लगते हैं. हालांकि फिल्म में कुछेक कॉमिक सीन्स और डायलॉग्स ऐसे हैं, जो बोझिल फिल्म से बने माहौल को थोड़ा लाइट करते हैं, लेकिन ऐसे मौके बहुत कम मिले हैं।
सिनेमेटोग्राफी
अस्पतालों में घूमती एक कहानी को इसके सिनेमैटोग्राफर ईशित नारायण ने अपने कैमरे से दर्शनीय बनाने में सफलता पाई है। अस्पताल का ऑपरेशन रूम हो या चाहे भोपाल शहर, इशित ने फ्रेम दर फ्रेम फिल्म को बढ़िया तरीके से प्रेजेंट किया है।
संगीत
फिल्म के म्यूजिक डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी अमित त्रिवेदी ने संभाली है। उनका गाना 'न्यूटन' फिल्म के दौरान फिट बैठता है। हालांकि अमित से उम्मीदें कहीं ज्यादा हैं, तो इस फिल्म में उनका काम अप टू द मार्क नहीं लगता है। एक भी गाना खत्म होने के बाद अपनी छाप छोड़ने में सफल नहीं होता। फिल्म के गानों से बेहतर फिल्म का पार्श्वसंगीत है। केतन सोधा का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की हर इमोशन को बिल्डअप करने में फ्यूल का काम कर रहा था
क्यों देखें Doctor G
वर्जित विषयों में एक आम हिंदुस्तानी परिवार के लड़के को फिट करने के आयुष्मान फॉर्मूले में इस बार शायद दर्शक थिएटर में खींचने को मजबूर न हो पाएं पर फिर भी अगर आप आयुष्मान खुराना के फैन हैं या फिर शेफाली छाया के तो इस फिल्म को देखने जाया जा सकता है। हां, अगर आप विशुद्ध हास्य फिल्म सोच के थिएटर जा रहे हैं, तो शायद आप निराश होकर निकलें।
• निर्माता : जंगली पिक्चर्स
• निर्देशक : अनुभूति कश्यप
• संगीत : अमित त्रिवेदी
• कलाकार : आयुष्मान खुराना, रकुल प्रीत सिंह, शैफाली शाह, शीबा चड्ढा
• सेंसर सर्टिफिकेट : ए
• फिल्म की अवधि : 2 घंटे 4 मिनट 16 सेकंड
• रेटिंग : 3.5/5
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