नानक जी की पवित्र वाणी सुनकर जब खारा पानी भी हो गया मीठा
<p><em><strong>आज कार्तिक पूर्णिमा को सिक्ख धर्म के प्रथम गुरु श्रीगुरुनानक देव जी का अवतरण दिवस भी है। आज के दिन को हमारे देश में ‘गुरुनानक जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। मानवता और प्रेम सौहार्द का संदेश और शिक्षा देने वाले गुरुनानक देव जी ने अपने पुरे जीवन काल में सम्पूर्ण मानव जाति को जहां एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया, वहीं देश और विदेश के कई स्थानों पर उन्होंने ईश साधना के साथ ही मानवता की प्रगाढ़ सेवा भी की। अपने जीवन की इसी यात्रा के दौरान श्री गुरुनानक देव ने अहिल्या की पावन नगरी इंदौर में भी प्रवास किया था। किस स्थान पर गुरुनानक देव जी रुके थे,आइए जानते हैं उस स्थान के बारे में।</strong></em></p> <p><em><strong>#gurunanakdev #indore #shreebetmasaheb </strong></em></p>
504 साल पहले अपनी दूसरी यात्रा के दौरा सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव जी महाराज इंदौर, बेटमा और ओंकरेश्वर आए थे। जहां -जहां गुरु महाराज ने शबद का पाठ किया वहां ऐतिहासिक महत्व के गुरुघर का निर्माण किया गया। पुरातन ग्रंथ गुरु खालसा में भी उनके 1517 में हुए इस आगमन का उल्लेख किया गया है। इन ऐतिहासिक गुरुद्वारों में आज भी प्रत्येक वर्ष प्रकाश पर्व के अवसर पर हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं।
ओंकारेश्वर में की थी तपस्या
जानकारी के अनुसार अपनी भारत यात्रा के दौरान श्रीगुरुनानक देव महाराष्ट्र के नासिक जिले से होते हुए मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में ताप्ती नदी के किनारे ठहरे, जहां से चल कर वे ओंकारेश्वर पहुंच और कुछ दिन ज्योतिर्लिंग मंदिर के परिसर में तपस्या की।
आज भी मीठा है इस बावड़ी का जल
श्री बेटमा साहिब से चलकर गुरुनानक देव इंदौर में वर्तमान राजबाड़े के नजदीक एक स्थान पर ठहरे। इंदौर में जहाँ गुरुनानक देव ठहरे उस स्थान पर उनके द्वारा एक इमली का पेड़ था। इस इमली के पेड़ के नीचे बैठ गुरु महाराज ने शबद का पाठ किया था वहां पर गुरुद्वारा इमली साहिब बना। गुरुसिंघ सभा के अध्यक्ष मनजीत सिंह भाटिया के अनुसार जहां-जहां गुरू नानक देव ने अपने शबद सुनाए वहां-वहां ऐतिहासिक महत्व के गुरुद्वारे बने। गुरूसिंघ सभा इसकी व्यवस्था संभाल रही है। इन गुरुद्वारों का विस्तार संगत की सुविधा के लिए किया गया है और इसका क्रम अभी भी जारी है। सभा के सचिव जसबीर सिंह का कहना है कि जहां नानक आए वह स्थान सिख समाज के लिए आस्था का केंद्र बन गया। हर साल यहां हजारों की संख्या में लोग मत्था टेकने आते हैं। उस स्थान को आज ‘गुरुद्वारा इमली साहब’ के नाम से जाना जाता है जोकि देश और इंदौर का एक सुप्रसिद्ध गुरुद्वारा है । इसके साथ ही इंदौर के गुरुद्वारा तोपखाना में भी गुरुनानक देव से संबंधित साक्ष्य मिलते हैं। इसके बाद वे इंदौर के नजदीक बेटमा में ठहरे जहाँ आज बेटमा साहब गुरुद्वारा है।
मान्यता है कि गुरुनानक देव के आने के बाद बेटमा की खारी बावड़ी का पानी भी मीठा हो गया था।इसके बाद इस गुरुद्वारे का नाम बावड़ी साहिब हो गया। आज भी इस बावड़ी का जल मीठा है जिसे श्रद्धालु अमृत के तौर पर सेवन करते हैं। यहां गुरुजी की चरण पादुका भी विराजित हैं। गुरु नानक देव जी यहां छह माह तक रुके थे। इसके साथ ही मध्य प्रदेश के उज्जैन और भोपाल में भी गुरुनानक देव के प्रवास के सबूत मिले हैं।
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