साहित्यिक फुहार भाग-2 : होली के शुभ अवसर पर रंग जाइये कवियों कृतियों के रंगों के साथ
<p><em>साहित्यिक फुहार भाग -2 : <br /> होली के इस रंगीन अवसर पर आज हम आपको रंग रहे हैं साहित्यिक फुहार से ....जी हाँ कुछ और प्यारे प्यारे रंग हमारे कवि/कवियत्रियों ने हमें भेजे हैं। आप भी पढ़ें और लुत्फ़ उठाएं और कमेंट कर के हमें बताएं भी। </em></p> <p> </p>
बात हो होली की और हम लोग ब्रिज की होली का ज़िक्र भी न करें , ऐसा तो हो ही नहीं सकता। अजमेर से कवियत्री प्रतिभा जोशी ने ब्रिज की कान्हा और गोपियों की होरी का क्या खूब वर्णन किया है। शीर्षक है " बिरज की होरी "
" लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में,
होरी आई रे ..
आई रे
लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में।
बिरज धरा आज रंगमई भई रे।
आई रे
लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में,
होरी आई रे ..
आई रे
लै रंग हाथ कन्हैया ठाड्यौ,
राधा रानी गुलाबी भई रे।
आई रे
लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में,
होरी आई रे ..
आई रे
भईं बावरी, कान्हा पीछे डोलें,
गोपिन हाथ धरे रंग रह गए,
आई रे
लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में
होरी आई रे ..
आई रे
श्यामसुंदर आयो पनघट पर,
हुलसित श्यामा रंगमयी भई रे,
आई रे
लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में,
होरी आई रे ..
आई रे
बिसरी गोपी मटकी भरन सब,
देखत श्याम श्याममय भईं रे।
आई रे
लो आई रे होरी कान्हा के बिरज में,
होरी आई रे ..
आई रे
नैकसो कान्हा नैक बंसुरिया,
प्रेम के रस में सबनै भिगोई रे,
आई रे
लो आई गई होरी कान्हा के बिरज में ।
होरी आई रे ..
बिरज धरा आज रंगमई भई रे
आई रे
होरी आई रे .."
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परिवार के संग रंगों का क्या और कितना महत्त्व होता है , बिन परिवार होली जैसे त्योहारों का मज़ा है या नहीं, भोपाल,मध्य प्रदेश की कवियत्री अंजलि खेर जी की कविता जिसका शीर्षक है "हर रंग कुछ कहता है" इसको पढ़कर ही लगाया जा सकता है :
"होली" पर बिटिया के घर आने से...
मेरा मन मयूर नाच उठा था..
अब होगी फूल मस्ती,,
अब मचेगा धमाल,,
हम सबके चेहरे पर सजेगा गुलाल,,
टेबल पर चटकीले गुलाल की ट्रे सजी थी ..
वार्डरोब में झकझक सफेद ड्रेस,,.
कडाही में छन छन सिकती गुजिया,,
पूरे घर को महका रही थी,,,
डायनिंग टेबल पर बाउल में
केसर डला श्रीखंड मनभावन लग रहा था,,
रंगों का यह त्योहार पावन सा लग रहा था,,
दोपहर चढ़ते चढ़ते,,,हँसी ठहाकों के साथ,,
रंगी पुती महिलाओं की टोली निकल पड़ी,,
थोड़ी चुटकियां,,,थोड़ी शरारतें
सबके हाथों में थे उनका मनपसंद गुलाल,,,
सबकी अलग अलग पसन्द देख मन मे उठे सवाल,,
क्या रंग भी कुछ बोलते है?
जी,,आपने कभी गौर किया??
हर रंग की होती अपनी खासियत,
हर रंग कुछ कहता है,
यक़ी माने न माने,ये रंग
हमारे व्यक्तित्व के राज खोलता है?
क्या आपके मन मे ये विचार आये है
ये जो खुशनुमा पल हमारे लिए संजोते..
ये रंग भला फिजा में किसने बिखराये है ?
यदि हम गौर करें तो..
जीवन दायी पानी-लहराती हवा
और यहां तक कि अंतरिक्ष भी बेरंग सारे है,
प्रकाश के पड़ते ही धरा पर
इंद्रधनुषी रंग सजते न्यारे है
इस तरह देखें तो..
रंग वह नही जो अंतस में समाया है
रंग वह है जो प्रकाश से उतसर्जित हो आया है
रंग वही जो अंधकार को समेट
जो अपने परिवेश में उजियारा बिखरता है
जिस तरह खुद को तराशने से ही
व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है
जी हाँ,
तो क्यों न हम इन सारे रंगों के गुणों को समेट
अपने व्यक्तित्व में चार चांद लगाए
अपनी सोच , अपने विचारों व भावों में
नये पंख हम सजाए,
अपने-अपनो -यारो-दोस्तो पर,
प्रीत,अपनेपन के खुशनुमा रंग बिखराये। "
कवियत्री डॉ शिप्रा मिश्रा जी अपनी कविता शीर्षक "होली के रंग"में होली के साथ प्राकृतिक वातावरण की तुलना कर निश्चय ही पाठकों का मन मोह लेंगी।
"धरती का रूप-रंग बदला
मन मयूर का थिरका मचला
सावन की छाई हरियाली
इंद्रधनुष की छटा निराली
पहनी धरती ने चुनर धानी
हरा रंग सबने पहिचानी
मिलते रंग इन्द्रधनुष बनता
इन रंगों से ही मस्ती छाता
रंग हिन्दू है ना मुसलमान
इन रंगों से अपनी पहचान
रंगों से मन को भिंगाओ तुम
एक यही गीत बस गाओ तुम
सूरज की लाली बनी रहे
हरियाली चूनर सजी रहे
काले मेघ लहराते रहें
नीले आसमान पर छाते रहें
केसरिया अपनी आन बने
पीला सबकी पहचान बनें
होली यही सिखाता है
रंगों का कलश गिराता है
सब मतभेद मिटाओ तुम
नेह-प्रेम सरसाओ तुम
ऊब-डूब उतराओ तुम
आंखों में बिछ जाओ तुम..."
जयपुर की कवियत्री अनूप कटारिया जी ने इस होली पर पर हमें ले गयी महाभारत के काल खंड में वर्तमान को जोड़कर कोनसा रंग दिखाया , उनकी रचना पढ़ें और थोड़ा सा गंभीरता का रंग लगा कर कुछ चिंतन भी करें :
"बजाओ ढफ और खड़ताल, पर
मत झगड़ो तुम आपस में
क्यों दुहराते हो महाभारत
मेरे समय का महाभारत तुम भूल गए
तब अर्जुन का सारथी बन
मैंने ही सारा खेल खेला
अब तो दुनिया में कौरव ही कौरव फैले हैं
रूस और यूक्रेन का युद्ध
इसका ज्वलन्त उदाहरण हैं
मेरे लिए धरती पर
अवतरण का कोई अर्थ नहीं है
अब कोई अर्जुन नहीं है
बन्धु जनों को देख जिसने
गाण्डीव छोड़ दिया था
मानवता का क्रूर रूप देख
मेरा चक्र हाथ से छूट रहा है
दुनिया का यह हाल देख
हृदय मेरा टूक टूक हो रहा है
लिया था जन्म मैंने जेल में
माँ देवकी तड़पती रही सलाखों में
अब तो प्रहरी ही लेकर मेरा रूप
नित नए नए खेल , खेल रहे हैं
कौनसा रूप धरूँ मैं ?
धैर्य मेरा टूट रहा है "
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