वो कठोर फैसले, जिनसे मुलायम ने बदली यूपी की सियासत
<p><em><strong>उन्होंने अपने कुछ फैसलों से देश और प्रदेश की सियासत को खासा प्रभावित किया।</strong></em></p>
देश में आपातकाल लग चुका था और इसके विरोध में आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन के अगुआ बनकर उभरे। आपातकाल के दौर में विरोध आंदोलन में रही उनकी सक्रियता के कारण वे 19 माह तक जेल में रहे। 1977 में चुनाव हुआ। देश और प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी। मुलायम की सक्रियता को देखते हुए यूपी सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया।
चंद्रशेखर के साथ जाने का निर्णय और उसका मुलायम की सियासत पर प्रभाव
सात दशक की राजनीति में 8 बार विधायक, सात बार सांसद, यूपी के मुख्यमंत्री और देश के रक्षा मंत्री तक बने मुलायम सिंह यादव का उत्तर प्रदेश की राजनीति में कद काफी बड़ा था। उन्होंने अपने कुछ फैसलों से देश और प्रदेश की सियासत को खासा प्रभावित किया। राम मनोहर लोहिया के निधन के बाद उत्तर देश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली पार्टी लोकदल मजबूत हो रही थी। मुलायम सिंह यादव इसी में शामिल हो गए। इसके बाद इमरजेंसी के विरुद्ध आंदोलन में मुलायम शामिल हुए। जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ सक्रिय रहे।
यूपी में वर्ष 1988 में विधानसभा चुनाव हुए और देश में आम चुनाव। जनता दल को तब यूपी की 425 सदस्यीय विधानसभा में 208 सीटें मिलीं। पूर्ण बहुमत से 5 कम। भाकपा के 6 और माकपा के दो विधायकों का समर्थन मिला और मुलायम सिंह यादव पहली बार सीएम बने। लेकिन, मामला गड़बड़ाने लगा। मुलायम ने केंद्र में वीपी सिंह की जगह चंद्रशेखर को समर्थन देना शुरू किया। चंद्रशेखर को कांग्रेस का समर्थन मिला। उन्हें पीएम बना दिया गया। मुलायम सिंह यादव सीएम बने रहे। लेकिन, केंद्र में चंद्रशेखर की सरकार गिरी तो मुलायम को भी पद से हटना पड़ा।
अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश
1990 में अयोध्या में रामसेवकों ने कारसेवा शुरू की। इसको लेकर तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने सख्त रुख अपनाया। सरकार के आदेश पर पहली बार 30 अक्टूबर 1990 को गोली चलाई गई। 5 कारसेवक मारे गए। विरोध में बड़ी कारसेवा की घोषणा हुई। 2 नवंबर को हजारों कारसेवक बाबरी मस्जिद के बिल्कुल करीब पहुंच गए। हनुमान गढ़ी के पास तब पुलिस ने गोली चलाई। सरकारी आंकड़ों में मौत का आंकड़ा डेढ़ दर्जन है। वास्तविक आंकड़े कहीं ज्यादा हैं। मुलायम के इस फैसले को उनके जीवन का सबसे विवादित फैसला माना जाता है।
अलग पार्टी बनाने का फैसला
यूपी में राममंदिर आंदोलन की बुनियाद पर पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। 6 दिसंबर को कारसेवकों ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। प्रदेश से कल्याण सिंह सरकार गिर गई। हालांकि, इससे पहले ही मुलायम सिंह यादव ने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी के गठन किया। यूपी के समाजवादी विचारधारा के नेता साथ आए और एक नई राजनीति की शुरुआत हुई।
बसपा से गठबंधन
मुलायम सिंह ने राजनीतिक रूप से बड़ा फैसला बहुजन समाजवादी पार्सटी से गठबंधन के रूप में लिया था। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भाजपा सरकार गिर चुकी थी। ऐसे में मुलायम ने कांशीराम के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ बड़ा गठबंधन कर लिया। यूपी की राजनीतिक फिजा में नारा गूंजा, मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम। कमंडल की राजनीति की ऐसी काट मुलायम ने खोजी कि भाजपा को राम मंदिर आंदोलन के उभार का भी फायदा नहीं मिल पाया।
कांग्रेस का समर्थन
मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2008 में कांग्रेस का समर्थन कर अपने रुख में बदलाव का संकेत दे दिया था। उस समय में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह न्यूक्लियर डील को लेकर संकट में आ गए थे। वामपंथी दलों के समर्थन वापसी के ऐलान के बाद मनमोहन सरकार के गिरने का खतरा था। ऐसे में मुलायम सिंह यादव ने मनमोहन सरकार का समर्थन कर उसे गिरने से बचा लिया।
अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला
वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी ने मुलायम सिंह यादव के चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष और छोटे भाई शिवपाल यादव खुद को उनका उत्तराधिकारी मान रहे थे। हालांकि, चुनाव में जब 403 सीटों वाली विधानसभा में सपा को 224 सीटों पर जीत मिली तो पूर्ण बहुमत की सरकार की कमान अखिलेश यादव को सौंप दी गई। शिवपाल यादव ने इस फैसले का विरोध भी किया लेकिन आजम खान अखिलेश के पीछे ढाल बनकर खड़े हो गए।
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