पूर्वजों का ऋण तो उतारना ही होगा..

<p><strong><em>अनेक बार यह प्रश्न उठता है कि पूर्वजों का श्राद्ध क्यों करना चाहिए..</em></strong><strong><em>? कई बार यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि पिता का सपिंडी कर्म कर दिये जाने के बाद यानी तीन पीढ़ियों में समाहित करने के बाद क्या दादाजी या परदादा जी के श्राद्ध के लिए पौत्र का उत्तरदायित्व बनता है..? प्रस्तुत है ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर देता यह आलेख.. &nbsp;</em></strong></p>

पूर्वजों का ऋण तो उतारना ही होगा..
20-09-2022 - 09:13 PM
21-04-2026 - 12:04 PM

देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित सूर्यवंशियों  को लेकर एक कथा है। यह कथा इस प्रकार है कि राजा सगर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे और इंद्र ने यज्ञ का घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम मे चोरी से बांध दिया। कपिल मुनि को यह बात की जानकारी नहीं थी। राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को अपने अश्वेध यज्ञ का घोड़ा ढूंढ़ने भेजा, राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़ा ढूंढ़ते- ढूंढ़ते कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे। यही नहीं राजा सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञ का घोड़ा बंधा देख कर कपिल मुनि को बिना वास्तविकता जाने अपशब्द कहने शुरू कर दिये।

कपिल मुनि का ध्यान भंग हुआ और खुद को अपशब्द कहे जाने पर वे क्रुद्ध हो गए और उन्होंने भी बिना वास्तविकता जाने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्म हो जाने का श्राप दे दिया । राजा सगर के दूसरे पुत्र अंशुमान को जब यह पता चला तो उन्होंने कपिल मुनि से श्राप मुक्ति का मार्ग बताने की प्रार्थना की। इस पर कपिल मुनि ने बताया कि माता गंगा के जल से ही श्राप से मुक्त होना संभव है।

राजा सगर को यह बात पता चली तो वो राजपाट अपने पुत्र अंशुमान को सौंपकर माता गंगा को पृथ्वी पर लेकर आने के लिए तपस्या करने चल दिए और तपस्या करते-करते ही उन्होंने देह त्याग दिया। इतना होने पर भी मां गंगा प्रसन्न नहीं हुईं। उसके बाद राजा सगर के पुत्र अंशुमान ने भी अपने पुत्र दिलीप को राजपाट सौंपकर माता गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या की लेकिन उनकी गति भी उनके पिता राजा सगर जैसी ही हुई। अंशुमान के बाद उनके पुत्र राजा दिलीप ने भी राज्य को अपने पुत्र भगीरथ को सौंप दिया और फिर मां गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या करने चल दिये। इसके बाद भी मां गंगा नहीं पसीजीं और उनका हाल भी अपने पिता अंशुमान और पितामह राजा सगर के जैसा ही हुआ। राजा दिलीप के बाद भगीरथ ने माता गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्हें भी एक बार नहीं बल्कि तीसरी बार की तपस्या में सफलता प्राप्त हुई। इसके बाद मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं और उनके साठ हजार पूर्वजों का उद्धार हो सका।

अब प्रश्न यह उठता है कि राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे जिनका उद्धार मां गंगा द्वारा ही, संभव था लेकिन राजा सगर, राजा अंशुमान, राजा दिलीप और महाराज भगीरथ ने सारे राजसी ठाठबाट और ऐश्वर्य को त्याग कर जंगलों में कठोर तपस्या क्यों की..?  पहली बात तो राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की आत्मा प्रेत योनि में इस भूलोक में विचरण कर रही थी और जब तक वो प्रेत योनि में रहते क्रोध और दुःख वश अपने कुल और परिवार को परेशान करते रहते । ध्यान रखने की बात यह है कि पितृ ऋण सिर्फ पिता का ही ऋण नहीं होता अपितु पूर्वजों के प्रति भी ऋण होता है, राजा सगर तो पिता थे और राजा अंशुमान उन साठ हजार के भाई थे लेकिन राजा दिलीप और महाराज भगीरथ के वो साठ हजार पूर्वज थे और पूर्वजों की मुक्ति मनुष्य का कर्तव्य होता है।

राजा सगर पिता व राजा अंशुमान उन साठ हजार के भाई थे, अगर इन्होंने उनकी मुक्ति का प्रयास नहीं किया होता तो मृत्यु पश्चात इन्हे पितृ लोक में अपने पूर्वजों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता और वहां ना तो इन्हे अपने पूर्वजों का सानिध्य मिलता और ना ही उनका आशिर्वाद । अगर इन साठ हजार की मुक्ति न हुई होती तो ये प्रेत योनि में रहकर अपनी कुल को परेशान करते और इनकी दुर्दशा देखकर राजा सगर के पूर्व पूर्वज आने वाली पीढ़ी से रूष्ट रहते जोकि पितृ दोष का कारण बनता और आने वाली पीढ़ी के पतन का कारण भी बनता।

कुण्डली का आकलन करते समय जातक की कुलदेवी/ देवताओं की स्थितियों का भी ध्यान रखें  

आजकल जन्म कुंडली देखने वाले ज्यादातर ज्योतिष और दिखाने वाले भी सभी बस कुण्डली के पीछे ही भागते हैं, कभी भी कुल देवी/देवता की स्थिति के बारे में नहीं पूछते और न ही परिवार में हुई अकाल मृत्यु के बारे में और न ही जातक बताते हैं। जब तक कुलदेवी/कुलदेवता नाराज हैं या उनका सही पूजा-पाठ नहीं हो रहा है और परिवार में हुए अकाल मृत्यु का समाधान नहीं हुआ है, तब तक कुंडली में कितना भी बड़ा राजयोग हो फिर भी जीवन में परेशानी आएगी ही आएगी। और कितना भी कुंडली का उपाय किया जाय फिर इच्छित परिणाम नहीं मिलेगा। यदि कुलदेवी सक्रिय हैं, उनका नियमित पूजा पाठ किया जा रहा है तथा अगर परिवार में अकाल मृत्यु हुई हो और उसका समाधान किया गया हो, तो कुंडली में दुर्योग भी उपाय से आसानी से कम हो जाते हैं। अगर कुलदेवी सक्रिय हैं तो जीवन में सभी समस्याओं का हल निकालने में मार्गदर्शन करती हैं और प्रगति का रास्ता भी दिखाती हैं। कुलदेवी और इष्ट देवता को साध लिया जाये तो जीवन की आधी समस्याएं अपने आप ही समाप्त हो जाती हैं इसलिए कुंडली देखने/दिखाने से पहले कुल देवी/कुल देवता की स्थिति जरूर देखनी चाहिए। इसके साथ ही घर में हुई अकाल मृत्यु की स्थिति बाद ही कुंडली बांचने के लिए आगे बढ़ना श्रेयस्कर होता है।

लेखकः- अज्ञात

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।