पहलगाम हमलावरों को अब तक सजा क्यों नहीं मिली, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का सवाल
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले को लगभग एक महीना बीत चुका है लेकिन हमलावर अब तक गिरफ्त से बाहर हैं ..
जयपुर। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले को लगभग एक महीना बीत चुका है लेकिन हमलावर अब तक गिरफ्त से बाहर हैं और बार-बार आश्वासन दिए जाने के बावजूद अब तक किसी की गिरफ्तारी को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है।
गहलोत के अनुसार, जनता में यह चिंता बढ़ती जा रही है कि क्या पाकिस्तान के साथ सैन्य कार्रवाई रोकने को लेकर जो समझौता हुआ था, उसमें आतंकवादियों को भारत को सौंपने की कोई शर्त शामिल थी या नहीं।
गहलोत ने यह भी दावा किया कि अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि 22 अप्रैल को हुए पहलगाम हमले, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी, वह एक "सुरक्षा चूक" का नतीजा था। लेकिन, यह अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है कि इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया गया और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
गहलोत ने ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, “यहां तक कि पुलवामा हमले (2019) के पांच साल बाद भी देश यह नहीं जानता कि उस सुरक्षा चूक के लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई हुई, और सैकड़ों किलो आरडीएक्स वहां तक कैसे पहुंचा।”
एक अन्य मुद्दे पर बात करते हुए गहलोत ने राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष (वासुदेव देवनानी) पर अपने पद की गरिमा और निष्पक्षता की कसौटी पर खरी न उतरने वाले फैसले लेने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, “पहले उन्होंने छह कांग्रेस विधायकों को निलंबित किया। फिर पहली बार सदन में मीडिया की अपुष्ट खबरों पर चर्चा की और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की अनुपस्थिति में उनके खिलाफ अनुचित टिप्पणियां कीं, जो जनादेश का अपमान है।”
गहलोत ने यह भी आरोप लगाया, “1 मई को अंता से बीजेपी विधायक कंवर लाल मीणा को तीन साल की सजा होने के बावजूद अब तक उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द नहीं हुई है। जबकि लिली थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि अगर किसी सांसद या विधायक को दो साल या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसी दिन से उसकी सदस्यता रद्द मानी जाएगी।”
उन्होंने यह भी बताया कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधायक नरेंद्र बुढानिया को 30 अप्रैल को विधानसभा की विशेषाधिकार समिति का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन अब उन्हें इस पद से हटा दिया गया है।
गहलोत ने कहा, “ऐसी समितियों के अध्यक्ष का कार्यकाल आमतौर पर कम से कम एक वर्ष होता है। संभवतः विधानसभा के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी अध्यक्ष को मात्र 15 दिन में हटा दिया गया हो।”
गहलोत ने कहा कि स्पीकर द्वारा लिए गए ये फैसले उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। “उन्हें इन फैसलों पर पुनर्विचार करना चाहिए और सदन की परंपराओं और कानून के अनुरूप कार्य करना चाहिए।”
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