बारह साल की सजा काट चुका ,पर अपराध के समय वो किशोर था,सुप्रीम कोर्ट ने किया रिहा
<p><em>सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति को रिहा करने का निर्देश दिया, जो 12 साल की कैद काट चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश यह पता चलने के बाद दिया कि जब उस व्यक्ति ने अपराध किया था तब वह किशोरावस्था में था । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के तहत अधिकतम सजा 3 साल है। याचिकाकर्ता 12 साल से अधिक कारावास की सजा काट चुका है। द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, खम्मम की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद याचिकाकर्ता को अब कैद में नहीं रखा जा सकता है।</em></p>
याचिकाकर्ता ने अपने किशोर होने के दावे के वैरिफिकेशन की मांग करते हुए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर करते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगी थी, जिन्होंने पुष्टि की थी कि अपराध के समय याचिकाकर्ता की उम्र 16 साल और 7 महीने थी।
और ज्यादा जेल में नहीं रखा जा सकता :सुप्रीम कोर्ट
बाद में याचिकाकर्ता ने किशोरवयता के सत्यापन की मांग करते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत ने कहा, “किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 15(1)(जी) के सहपठित धारा 16 के मद्देनजर, याचिकाकर्ता की हिरासत में रहने की अधिकतम अवधि तीन वर्ष है। हालांकि, चूंकि हमारे सामने वर्तमान रिट याचिका में पहली बार किशोरवयता की दलील उठाई गई थी, 2005 में शुरू हुई आपराधिक कानून की प्रक्रिया के कारण याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया गया और ट्रायल कोर्ट द्वारा एक साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस बीच, याचिकाकर्ता 12 साल से अधिक कारावास की सजा काट चुका है। द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, खम्मम की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद याचिकाकर्ता को अब कैद में नहीं रखा जा सकता है।"
बता दें कि याचिकाकर्ता को 2009 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 34 सहपठित धारा 302 के तहत दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।तब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सजा की पुष्टि की थी।
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